He has no choice

Hadiya |
Raju-ji is a very familiar presence to us. We have met him so many times in Khirki. He sits at a corner of one of the lanes and repairs all kinds of footwear. We chose this site for one of our wall-painting projects. He did not object, in fact he appreciated what we painted on the wall behind him. We depicted female cobblers at work – we wanted to make the point that if women have the will, they can push past social and gender limitations and actually achieve their goals. Some people who saw the painting as they passed by or brought shoes for repair had a negative opinion, because the foot of one of the painted figures is above Raju-ji’s head. But the most important thing for us was what Raji-ji thought of our work. He didn’t care what others thought, and really loves the painting.

I asked Raju-ji about his life-journey and how he became a cobbler. He said he came from a poor family. His grandfather and father were also cobblers, but no one had taught him, he had trained himself in this occupation. When he was a child he was sent daily to take food to his father from his home. He used to sit at his father’s work-space and watch him for hours. In this way, by the age of seven or eight he had learnt the basics of how to fix footwear.

Shoe repair and polishing was not Raju-ji’s first work. He washed cars, sold pens and other items on the roadside and did many other small jobs to contribute to the family income. At the age of thirteen he first started to repair shoes himself in Khanpur. He tried working in different south Delhi localities – Saket, Nehru Place, Lajpat Nagar – but these were too far from his home and he had to pay almost Rs 100 daily for transportation by auto, almost half his daily earnings. Travelling by bus or metro would be cheaper and faster but Raju-ji doesn’t like crowds, so he preferred to change his workplace rather than take buses or trains. Finally he decided to work in Khirki, and he has now been here for seven years.

The local people know Raju-ji really well, and he has developed a good relationship with them. He gets about 20 customers per day, and most of them are women and children. His daily earnings are around Rs 400. He is full of stories, and you cannot get bored talking to him. He is never alone – there is always someone sitting beside him, chatting and laughing with him as he works. But when I first started talking to him about his life people would come to his corner and stare at us, sometimes with smiles on their faces. This made me very uncomfortable. One day a friend who was with me took some photos of me with Raju-ji on her phone, and the locals watching us assumed we were going to upload these online. They asked me if we were going to put this on YouTube. I said no, and just walked away. This was the only disruption of my interviews with Raju-ji.

Raju-ji is a very kind, friendly and open-minded person. The one thing that makes him angry is customers who leave their shoes with him for repair, saying they will return by such-and-such time later in the day, but don’t show up. This happens many times. Then he has to take their shoes home with him, which adds to his transport expenses. It becomes a burden he has to protect when he takes an auto home, or if he is with friends they walk home together carrying the load of unclaimed footwear.

Raju-ji has been harassed by the police many times, and once he even had to close his stall for some days because of this threat. But his family and friends helped him to open it again and start working. He is a sort of artist himself, because he loves to decorate – when he has extra money, he buys shoe materials and makes footwear to put in front of his stall.

We have never had any problem communicating with Raju-ji about our wall-painting or any topic about his life. He told us that as a child his dream was to finish high school and college, but poverty forced him to drop out as a young teenager and start working in order to add to the household income. When I first talked to him, he seemed to be grateful for everything he had – it was as if he was content with his life and didn’t expect or want anything more. But when we talked in more detail I came to understand that his life is not easy. He is not able to spend much time with his wife and children. And he has no choice except to keep working, whether it is hot or cold or raining, and even if he is sick, because each day he has to earn so that each day his family can eat.


वह और क्या करे

हादिया |

रा जू जी को हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं। खिड़की में उनसे हमारी कई बार मुलाकात हुई है। वे यहां एक गली के नुक्कड़ पर बैठते हैं और हर प्रकार के जूतों की मरम्मत करते हैं। हमने इस जगह का अपनी वाल-पेंटिंग परियोजना के लिए चुनाव किया था। उन्हें न केवल इस बात पर कोई एतराज नहीं था, बल्कि सच बात ये है कि उन्होंने दीवार पर बनी उस तस्वीर की तारीफ़ भी की थी। दरअसल, उस तस्वीर में हमने मोची का काम करने वाली कुछ औरतों का चित्रण किया था। इसके जरिये हम यह कहना चाहते थे कि अगर औरतें इरादा कर लें तो वे सामाजिक और जेंडरगत सीमाओं को धता बता कर अपना मक़सद हासिल कर सकती हैं। तस्वीर के बारे में वहां से गुजरने वाले कुछ राहगीरों और राजू जी के पास मरम्मत के लिए आने वाले चंद और लोगों की राय नकारात्मक थी। इसकी वजह यह थी कि तस्वीर में दिखाया गया एक पैर राजू जी के ऐन सिर पर पड़ता दिखाई दे रहा था। लेकिन हमारे लिए सबसे अहम बात यह थी कि राजू जी का ध्यान केवल हमारी कला पर था। उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि लोगबाग तस्वीर के बारे में क्या सोच रहे हैं। उन्हें यह पेंटिंग पसंद आई थी।
मैंने राजू जी से उनकी आपबीती के अलावा यह भी पूछा कि उन्होंने मोची का काम कैसे शुरू किया। राजू जी ने बताया कि उनके दादा और पिता भी यही काम करते थे, लेकिन उन्होंने यह काम उनसे न सीखकर अपने आप सीखा है। राजू जी जब बच्चे थे तो उन्हें अपने पिता के लिए ठीहे पर खाना लेकर पहुंचाना होता था। तब वे पिता के ठीहे पर बैठ कर उन्हें घंटों काम करते देखते रहते थे। इस तरह, सात साल की उम्र तक राजू जी जूते मरम्मत करने के बुनियादी गुर सीख चुके थे।
लेकिन जूते की मरम्मत और पोलिश के काम से पहले राजू जी अपने परिवार की सहायता के लिए कार की धुलाई, सड़क के किनारे पेन व अन्य चीजें बेचने से लेकर और भी कई तरह की छोटी-मोटी नौकरियां कर चुके थे। तेरह साल की उम्र में उन्होंने पहली बार खानपुर में जूतों की मरम्मत का काम शुरू किया। उन्होंने दक्षिणी दिल्ली के साकेत, नेहरू प्लेस और लाजपत नगर जैसे कई इलाकों में किस्मत आजमाई। लेकिन ये जगहें उनके घर से इतनी दूर पड़ती थी कि उनकी रोजाना की कमाई के सौ रूपये ऑटो से आने जाने पर ही खर्च हो जाते थे। आने जाने का यह ख़र्च उनकी कमाई का लगभग आधा बैठता था। काम पर जाने के लिए बस या मेट्रो का किराया कम पड़ता था और इसमें वक़् त भी कम लगता था, लेकिन राजू जी को भीड़भाड़ पसंद नहीं थी। इसलिए उन्हें बस या ट्रेन का चक्कर छोड़कर काम की जगह बदलना ज़्यादा ठीक लगा। आख़िर में, उन्होंने अपना काम खिड़की में जमाने का फ़ैसला किया। अब उन्हें यहां काम करते हुए सात साल हो गए हैं।
राजू जी को स्थानीय लोगबाग बहुत अच्छी तरह जानते हैं। लोगों के साथ उनके संबंध बेहद अच्छे हैं। उनके पास हर दिन लगभग बीस ग्राहक आते हैं जिनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या ज़्यादा रहती है। राजू जी हर दिन लगभग चार सौ रुपये कमा लेते हैं। उनके पास क़िस्सों का एक भरा-पूरा ख़जाना है। उनसे बात करते हुए आप कभी बोरियत महसूस नहीं कर सकते। वे कभी अकेले नहीं होते। उनके पास कोई न कोई हमेशा बैठा रहता है। राजू जी साथ बैठे आदमी से गप्प करते रहते हैं और साथ में अपना काम भी करते जाते हैं। लेकिन मैं जब उनसे पहली बार मिलने गयी और उनसे उनकी आपबीती के बारे में बात करने लगी तो लोगबाग उनके ठीहे पर इकट्ठा होने लगे और मुझे घूर कर देखने लगे। मैं यह देखकर बेहद बेचैन हो गयी। एक दिन जब मैं राजू जी से बात करने पहुंची तो मेरे साथ मेरी एक दोस्त भी थी। दोस्त ने अपने फोन से मेरे और राजू जी के कई फोटो खींचे। हमें देखने वाले लोगों को लग रहा था कि हम इन फोटो को ऑनलाइन कर देंगे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं इन फोटो का यूट्यूब पर डालने जा रही हूं। मैंने कहा कि मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है और वहां से तुरंत चलती बनी। इसके अलावा राजू जी के साथ मेरी बातचीत में और कोई दिक़्क़त नहीं आई।
राजू जी बहुत नरमदिल, दोस्ताना और खुले दिमाग़ के आदमी हैं। उन्हें केवल उन ग्राहकों पर गुस्सा आता है जो उनके पास मरम्मत के लिए लाए गए जूते छोड़ते हुए यह कह कर चले जाते हैं कि वे दिन में फलां-फलां समय पर जूते लेने आएंगे, लेकिन वे तयशुदा वक़्त पर कभी नहीं आते। ऐसे में, उनके जूतों को घर लेकर जाने और वापस लाने की ज़िम्मेदारी उन पर आ जाती है। ऐसे समय पर राजू जी अपने किसी दोस्त की मदद से इन जूतों को घर ले जाते हैं।
राजू जी को कई दफ़ा पुलिस के हाथों तंग होना पड़ा है। एक बार तो इस कारण उन्हें अपना ठीहा कई दिनों तक बंद रखना पड़ा था। लेकिन फिर उनके परिवार और दोस्त उनकी मदद के लिए आगे आए और राजू जी दुबारा काम करने लगे। राजू जी के अंदर ख़ुद भी एक कलाकार बैठा है। उन्हें चीजों को सजाने-संवारने में मज़ा आता है। जब भी उनके पास थोड़ा सा ज़्यादा पैसा होता है तो वे जूते बनाने का कच्चा माल ले आते हैं और इस माल से नये जूते बनाने लगते हैं। अपने बनाए जूतों को वे अपने ठीहे पर सामने की ओर रखे रहते हैं।
दीवार पर पेंटिंग बनाने या आपबीती पर बात करने के मामले में राजू जी के साथ हमें कभी कोई समस्या नहीं आई। उन्होंने बताया कि बचपन में वे हाई स्कूल पास करने के बाद कॉलेज में पढ़ने का सपना देखते थे लेकिन ग़रीबी के कारण उन्हें लड़कपन में ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। मैंने जब उनसे पहली बार बात की थी तो मुझे वे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में नज़र आए थे जो अपने जीवन से संतुष्ट रहता है। उन्हें ज़्यादा की चाहत नहीं थी। उनके पास जो भी था, उसी से ख़ुश दिखाई देते थे। लेकिन जब मैंने उनके साथ और गहराई से बात कि तो मुझे समझ आया कि उनका जीवन इतना सरल नहीं है। वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ज़्यादा वक़्त नहीं बिता पाते। काम करना राजू जी के लिए एक बाध्यता है। गर्मी हो, सर्दी हो, बारिश का मौसम हो या वे ख़ुद बीमार पड़े हों- राजू जी किसी भी सूरत में काम नहीं छोड़ सकते क्योंकि परिवार का पेट भरने के लिए उन्हें हर दिन कमाना होता है।

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