‘मर्दों की गली में’ जवान मां

नर्गिस |

खिड़की एक्सटेंशन के जिस इलाके में मैं रहती हूं उसे मेन रोड से जोड़ने वाली एक गली में हर वक़्त इतने आदमी आते-जाते हैं कि मैंने उसका नाम ही ‘मर्दों वाली गली’ रख दिया है। जब से काबुल छोड़ कर मेरा परिवार यहां दिल्ली आकर बसा है, तब से अपनी बस्ती से बाहर जाने के लिए यही गली मेरा रास्ता रही है। दिन के वक़्त यहां मर्दों का हुजूम इकट्ठा रहता है। रात को उनकी भीड़ और बढ़ जाती है। उस वक़्त आपका बहुत से पियक्कड़ों से वास्ता पड़ता है। खिड़की में आने के बाद मैं पहले साल तक इस गली को आसानी से पार नहीं कर पाती थी क्योंकि बहुत से मर्द मेरी तरफ इस तरह घूरते थे जैसे उन्होंने लड़की-जात को पहले कभी देखा ही न हो। यह हाल तब है जब कि खिड़की में पहले सी ही कई अफगानी परिवार रहते हैं। लोगों की इस टकटकी से मैं असहज हो जाती थी।

दिल्ली में जब मैंने पहले पहल स्कूल जाना शुरू किया तो मैं यह देखकर अचरज में पड़ जाती थी कि गली में पूरे दिन इतने मर्द क्यों रहते हैं। लेकिन एक दिन बस स्टॉप की ओर जाते हुए मैंने उन लोगों के हाथों में ऐसे औजार देखे जिनका इमारत बनाने के काम में इस्तेमाल किया जाता है। मुझे कुछ समझ नहीं आया क्योंकि उस वक़्त खिड़की में कहीं भी कोई इमारत नहीं बन रही थी। अगले दिन मैंने गली में एक टेम्पो खड़ा देखा। आसपास जमा लोगों में एक बॉसनुमा आदमी को देखा जो चिल्लाते हुए कह रहा था: ‘जल्दी-जल्दी चलकर गाड़ी में बैठो, हम काम के लिए लेट हो रहे हैं’। मुझे समझ आ गया कि वे लोग सुबह-सुबह गली में इकट्ठा होते हैं। यहां वे उन टेम्पुओं का इंतजार करते हैं और उनमें बैठकर दिहाड़ी मजूदरी के लिए निकल जाते हैं। दिहाड़ी पर काम करने वाले ये मजदूर किसी ऐसी जगह काम करते हैं जहां कोई बिल्डिंग बन रही होती है। लेकिन वह गली शाम के वक़्त भी मर्दों से भरी रहती है। मर्दों की इस भीड़ में काम से लौटकर आए मजूदर भी शामिल रहते हैं। वे इस वक़्त सामान बेचने वाले लोगों के आसपास मजमा लगाए रहते हैं। उनमें कुछ बात कर रहे होते हैं, कुछ खाने की चीजें ख़रीद रहे होते हैं तो कुछ दिन का काम ख़त्म होने के बाद अलग-अलग टोलियों में खड़े होकर मौज-मस्ती कर रहे होते हैं।

एक दिन अपने दोस्तों के साथ उस गली से गुजरते हुए मैंने एक जवान औरत को छोटे से ठीहे पर पकौड़े बनाते देखा। वह चारों ओर मर्दों से घिरी थी। खिड़की और हौज रानी में औरतों को खाने की चीजें या दूसरी तरह के सामान बेचते देखना कोई अजूबी बात नहीं है, लेकिन उस औरत पर मेरा ध्यान इसलिए गया क्योंकि वह बहुत जवान दिख रही थी। उसके बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ती ही गयी। आखिर में मैंने उससे बात करने और मिलने का फैसला किया। मैं उसके ठीहे पर पहुंची और उससे बात करने लगी। उसका नाम रचना बेगम है और वह उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखती है। उसकी उम्र चैबीस साल है और वह शादीशुदा है। पहली मुलाक़ात के वक़्त हम चंद मिनटों बाद ही एक दूसरे पर भरोसा करने लगे। उसने मुझसे मेरे नाम के साथ यह भी पूछा कि मैं कहां से आई हूं। तीसरी मुलाक़ात होते-होते उसका बर्ताव बेहद दोस्ताना हो गया था। धीरे-धीरे हम गहरे मुद्दों पर भी बात करने लगे और वह मुझसे बेहिचक बात करने लगी। मैं उससे लगभग पांच बार मिलने गयी थी।

शादी से पहले रचना साउथ एक्सटेंशन में रहती थी। शादी के बाद वह पहले हौज रानी में रही और फिर यहां खिड़की एक्सटेंशन में आ गयी। अब खिड़की में रहते हुए उसे डेढ़ साल हो गया था। उसका पति लकवा ग्रस्त है, इसलिए परिवार में वहीं अकेली कमाने वाली है। उसके दो बेटे हैं जिनमें एक पांच साल का और दूसरा एक साल का है। वह एक बहादुर औरत है। लेकिन उसका मिजाज बहुत शांत और विनम्र है।

हौज रानी में रचना के पास एक छोटा सा स्टाल था जहां वह चाय, नाश्ता (आलू-पूरी), अंडे, चाउमीन और प्याज व आलू के पकौड़े बेचा करती थी। उसका स्टाल सुबह दस बजे से रात के दस बजे तक खुला रहता था। उसकी यह दुकान केवल दोपहर बारह से तीन बजे के बीच ही बंद रहती थी। उसके पास गैस का एक सिलेंडर और स्टोव था। वह खाना बनाने के लिए अलग-अलग बर्तनों का इस्तेमाल करती थी। इन सामानों को उसके स्टाल तक पहुंचाने के लिए दो लड़के मदद करते थे।

एक दिन हौज रानी वाले घर के मकान मालिक ने उससे कहा कि वह मकान को दुबारा बनाना चाहता है, इसलिए उसे घर खाली करना होगा। उन्हें खिड़की में किराये का घर तो मिल गया लेकिन उसे सड़क पर अपना ठीहा जमाने की जगह नहीं मिल रही थी। जिन दिनों वह अपने ठीहे की तलाश कर रही थी तो उसके पति के दोस्त ने कहा कि वह अपना काम उसकी बिल्डिंग के सामने शुरू कर दे। यह जगह उसी गली में खोज नामक कला-केंद्र के सामने पड़ती थी।

उसने पाया कि खिड़की के ग्राहक हौज रानी के ग्राहकों से अलग क़िस्म के हैं। लेकिन दोनों ही जगहों की सड़कों पर औरतों के बजाय मर्दों की संख्या ज़्यादा रहती है। उसके ठीहे पर चाय पीने और पकौड़े खाने के लिए आमतौर पर स्थानीय मर्द ज़्यादा आते हैं। कभी-कभी उसके यहां औरतें भी आती हैं, लेकिन उसके ग्राहकों में उम्रदराज लोग न के बराबर होते हैं। अफगान परिवार दोनों इलाकों में रहते हैं, लेकिन उससे बातचीत करने वाली पहली अफगानी महिला मैं ही थी। रचना बेगम का कहना है कि ‘अच्छा’ ग्राहक वह होता है जो अपना सामान लेकर आगे बढ़ जाता है। वर्ना बहुत से ग्राहक अनैतिक होते हैं, वे न केवल चीज के दाम को लेकर बहसबाजी करते हैं बल्कि बेवजह नजदीक आने की कोशिश करते हैं। वह गली में काम करने वाले और अपनी दुकान पर पकौड़े ख़रीदने के लिए आने वाले लोगों से फालतू बात नहीं करना चाहती। एक बार रचना से मिलने के लिए मेरी दोस्त साबरा भी मेरे साथ गयी थी। उसने बताया कि जब कोई मर्द रचना के स्टाल पर आता है तो रचना उससे आंख न मिलाकर चाय या पकौड़े बनाने के काम में डूबी रहती है। मैंने उससे इस बारे में कोई बात नहीं की क्योंकि मुझे लगा कि कहीं मेरा सवाल सुनकर वह परेशान न हो जाए।

लेकिन मैंने उससे यह बात जरूर पूछी कि रात दस बजे तक मर्दों की भीड़ में अकेले खड़ा रहना उसे कैसा लगता है। उसने कहा, ‘मैं ख़ुद को मर्दों के बराबर समझती हूं इसलिए डरने की कोई बात नहीं होती’। उसने यह भी कहा कि वह यह काम पिछले छह सालों से करती आ रही है। उसने बताया कि उसका परिवार यह काम तीस बरसों से करता आ रहा है, इसलिए काम करने का यह हुनर उसे विरासत में मिला है। मैं यह मान कर चल रही थी कि उसे यह काम जैसे-तैसे गुजारा करने और परिवार का पेट पालने के लिए करना पड़ रहा होगा, इसलिए गली में हर दिन की भीड़ को झेलना उसकी मजबूरी थी। लेकिन, सच्चाई यह निकल कर आई कि वह अपने आसपास खड़ी मर्दों की भीड़ से जरा भी असहज नहीं होती।

मैं लोगों से मेलजोल नहीं बढ़ा पाती। इस शर्मीलेपन से मैं आज तक बाहर नहीं आ सकी। यही वजह है कि मैं कभी अच्छे मौक़ों का फायदा नहीं उठा सकी। लेकिन रचना से मिलने के बाद मेरे भीतर कुछ बदल सा गया। मुझे ख़ास तौर पर यह महसूस हुआ कि इस देश में बाहर से आने वाली एक लड़की के तौर पर मुझमें बाहरी परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की कूवत होनी चाहिए। अपने परिवार को चलाने के लिए वह सुबह से लेकर रात तक पूरी हिम्मत के साथ काम में जुटी रहती है। उसे देखकर मुझे भीड़ भरी जगहों और खिड़की की उस गली में मर्दों की मौजूदगी के डर से लड़ने की हिम्मत पैदा हुई। मैंने यह भी महसूस किया कि अब मैं रास्ते में बिना डरे खड़ी हो सकती थी और आर्ट के प्रोजेक्ट में काम करने वाले अपने दोस्तो के साथ इलाके की दीवारों पर बेखटके तस्वीर उकेर सकती थी। शुरू में मुझे खुले में खड़े होकर दीवार पर तस्वीर बनाते हुए डर लगता था। तब मैं अपने चेहरे पर स्कार्फ बांधकर जाया करती थी। लेकिन सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर पेंटिंग करने के इस काम से मेरी हिम्मत में और इजाफा हुआ। और जल्दी ही मैं ‘मर्दों वाली’ उस गली से बिना किसी मानसिक तनाव के आने जाने लगी।

रचना बेगम से पांचवी मुलाक़ात के बाद मैं उससे एक महीने तक दुबारा नहीं मिल पाई। इसकी कई वजहें थीं। लेकिन, आखिरकार जब एक दिन मैं वहां पहुंची तो मैंने उसे नदारद पाया। मैं वहां बार-बार जाती, लेकिन उसका ठीहा हर बार सूना मिलता। आख़िर में मैंने वहां खड़े कुछ मर्दों से उसके बारे में पूछा तो पता चला कि उसकी दुकान कई हफ्तों से बंद पड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि अब उसके वापस आने की संभावना भी कम है। यह जान कर मैं बहुत बेचैन हो गयी। मुझे उसका बार-बार ख़याल आता। मुझे लगता कि मैंने एक दोस्त खो दिया है। आज जब भी मैं ‘मर्दों वाली’ उस गली से गुजरती हूं तो मेरा ध्यान बरबस रचना और उसके ठीहे की ओर चला जाता है। और मेरे दिल में फिर एक उम्मीद जगने लगती है कि शायद किसी न किसी दिन वह मुझसे टकरा जायेगी।


Young Mother in the ‘Lane of Single Gents’

Nargis |

The particular lane in Khirkee Extension connecting the locality to the main road is always full of men, so I named it as the ‘Lane of Single Gents’. Ever since my family migrated to India from Kabul, and settled in Delhi, this lane has been my path to anywhere outside the locality. During the day it is crowded with men, and at night the crowd increases, and at that time you come across lots of drunken men. During my first year in Khirki I was not able to cross that lane easily because the men stared at me as if they had not seen such a human earlier, though many Afghan families live in Khirkee. The way the men looked at me made me very uncomfortable.

When I first started going to school in Delhi, I always wondered why there were crowds of men all day in the lane. But one day on the way to the bus stop I noticed they had construction tools in their hands, even though there was no construction work going in Khirkee at that time. The next day I saw many tempos in the lane, and one of the men, sounding like a boss, shouting to the others, “Come on, get in the vehicle, we are getting late for work!” I understood that the men would gather in the lane in the morning and wait to be picked up to be taken elsewhere for daily-wage construction labour. But the lane is also full of men in the evening, including those workers back from their labour and standing around the vendors, chatting, buying food or standing in groups and enjoying relaxation after the day’s work.

Walking through the lane with my friends one day, I noticed a young lady selling pakodae from a small stall, surrounded by men. It is not unusual to see women selling food and other items in Khirki and Hauz Rani, but this particular lady caught my eye because she looked very young. My curiosity grew, and I decided to talk to her and learn more about her. I went to her stall and started chatting with her. Her name is Rachna Begum and she is from Uttar Pradesh. She is 24 years old, married. At our very first meeting, after talking for a few minutes we began to trust each other. She asked me my name and where I was from. By the third visit she had become very friendly. Our conversation deepened and she talked to me without any hesitation. I visited her about five times.

Before marriage Rachna Begum lived in South Extension. After her marriage she moved first to Hauz Rani and then to Khirki Extension. She had been living in Khirkee for the past one-and-a half months. She is the earning member of her family as her husband is paralyzed. She has two sons, one is five years old and the other is one year old. She is a brave woman, but also quiet and humble.

In Hauz Rani Rachna Begum had a small stall where she sold tea, breakfast (aloo-puri), eggs, chowmein and pakodae (onion and potato). She ran the kiosk from 10 am to 10 pm, taking an afternoon break from 12 to 3 pm. She had a gas cylinder and a stove, and used separate utensils for each type of food preparation. Two boys helped her to carry these things to her stall.

One day the owner of the house she rented in Hauz Rani asked her and the family to leave as he was going to rebuild it. They found a house in Khirkee and took it on rent, but Rachna Begum was not able to find a place on the street to set her stall. While she was searching, her husband’s friend told her to set her stall in front of his building, which is opposite Khoj, an arts organization in the same lane.

She found customers to be different in Hauz Rani and Khirki, but in both places there are many more men than women in the street. Mostly local men come to her stall to buy tea and pakodae. Sometimes she has women customers, but rarely any old people. Afghan families live in both localities, but I was the first Afghan to interact with her. For Rachna Begum, a ‘good’ customer is one who buys what he or she wants and then moves on. There are other customers who are unethical, argue about the price, or try to be too friendly. She does not like talking unnecessarily to random people, like men who work in that lane and come to buy pakodae from her. My friend Sabra accompanied me on one of my visits, and she noticed that when a male customer comes to the stall Rachna Bagum avoids eye contact with him and focuses her attention entirely on preparing the tea or pakodae. I did not ask her about this because I thought she might feel uncomfortable having to explain her habits.

But I did ask her how it felt to stand by herself among crowds of men till 10 pm. She said, “I consider myself equal to a man, and so there is nothing to be scared of.” She also said that she had been doing this work by herself for six years; that selling street food had been the family profession for thirty years, and she had inherited the skills. I had assumed she was forced to do this work for survival and to feed her family, and so had to endure the daily crowds in the lane, but it turned out that she is actually not at all bothered by the male-dominated atmosphere around her.

I have a reserved nature and it has always been difficult for me to overcome my shyness, so I have not been able to take advantage of good opportunities that were offered to me. But meeting Rachna Begum changed something within me, especially in terms of having to adapt as a young foreign girl in this country. Seeing her confidently working by herself from morning to night to support her family gave me the courage to overcome my fear of crowded public space and the presence of men in Khirkee’s lanes. I also found that I was able to stand without fear in the street, painting scenes on the locality wall with my friends in the art project. At first I was afraid to stand in full view and do the wall-paintings. I would cover my face with my scarf on our way to the site. But this act of painting in public gave me even more courage, and soon I was able to walk by myself without any mental discomfort through the ‘Lane of Single Gents’.
For various reasons, for a month after my fifth visit I was not able to go to Rachna Begum’s stall and talk to her. When I did finally go to her site one evening, I saw that she was no longer there. I returned repeatedly on other days, but the site remained empty. Finally I asked a couple of men standing there whether they had seen her. They said that she had not been putting up her stall for the past few weeks. They also said that she might not be coming back. I became very upset. Her absence kept bothering me, and I felt as if I had lost a friend. However, each time I walk down the ‘Lane of Single Gents’ I find myself looking at the place where Rachna Begum had her stall, and find myself once again hoping to meet her there.

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