एक अजनबी की मौत

साबरा |

वह जब अफ़गानिस्तान से भारत आया था तो मेरी उम्र नौ साल थी। मुझे अब वाक़ई याद नहीं पड़ता कि वहां मेरी शुरूआती जि़ंदगी किस तरह की थी। हमारे शहर काबुल में अपहरणकर्ताओं के आंतक के कारण अब्बा और चाचा मुझे घर से बाहर नहीं जाने देते थे। मैं बाहर बच्चों के साथ खेलना चाहती थी लेकिन मुझे इसकी इजाज़त नहीं थी। मेरा भाई, चचाज़ाद भाई और मैं घर के अहाते में खेला करते थे। इसलिए मेरी याद में अब सिर्फ हमारा अहाता और स्कूल जाने वाला रास्ता रह गया है।
हमारे घर के एकदम उल्टी तरफ़ पुलिस थाना पड़ता था। पुलिस वाले हमारे साथ अच्छा बर्ताव करते थे। वे हमें खाने के लिए टॉफी दिया करते थे, लेकिन चाचा नहीं चाहते थे कि हम उनसे बात करें। एक बार मेरे पास जेब ख़र्च से जुड़े पैसे रखे थे। अब्बा और चाचा घर से बाहर गए हुए थे। इस तरह हमारे पास बाहर निकलने का अच्छा मौक़ा था। मैंने अपने चचाज़ाद भाई और सगे भाई से कहा कि, ‘चलो, बाहर चलकर आइसक्रीम खाई जाए’। और वे मेरे साथ चलने को राजी हो गए। यह पहली बार था कि हम बग़ैर इजाज़त घर से बाहर निकले थे। हम मजे कर रहे थे लेकिन तभी अचानक हमें एक पुलिस वाले ने अपने पास बुलाया और हमसे बात करने लगा। वह पूछने लगा कि हमारे घर में क्या-क्या चल रहा है। मैं यह सोचकर डर गयी थी कि अगर इस वक़्त अब्बा और चाचा आ गए और उन्होंने हमें रास्ते में देख लिया तो वे ग़ुस्से में आकर हमें मार ही डालेंगे। अचानक मेरा ध्यान चाचा की तरफ़ गया और मैंने चिल्लाते हुए दोनों को सावधान कर दिया। मेरी आवाज़ चाचा तक पहुंच गयी थी। उन्होंने देख लिया कि मैं पुलिस वाले के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे फ़ौरन घर जाने का हुक़्म दिया और इसके बाद दोनों भाईयों की इतनी बेदर्दी से पिटाई की कि उनके हाथ-पांव और मुंह सूजकर लाल हो गए। इस घटना के बाद हमने फ़ैैसला कर लिया कि उनकी इजाज़त लिए बग़ैैर हम कभी घर से बाहर नहीं निकलेंगे।
खिड़की में कई अफ़गानी परिवार रहते हैं। मैंने वहां अफगानिस्तान से आए एक मोची को देखा। वह बहुत बूढ़ा था। उसके बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे और वह बहुत धीमे-धीमे बोलता था। इसके बावजूद वह थोड़ी सी कमाई के लिए दिन भर झुलसती गर्मी में सड़क पर बैठा कड़ी मेहनत करता रहता था। भारत आने से पहले मैंने कभी अजनबियों से बात नहीं की थी। न ही मैंने यह जानने की कोशिश की थी कि बाक़ी लोग किस तरह जीवन जीते हैं। लेकिन, मैं इस आदमी के बारे में सचमुच जानना चाहती थी। लिहाजा एक दिन मैं उसके पास पहुंची और उसकी जि़ंदगी के बारे में पूछताछ करने लगी। मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि उसने मेरे सवालों का बहुत ध्यान से जवाब दिया।
उसका नाम अयातुल्ला है। उसकी उम्र 76 साल है। शुरू में उससे मिलने के लिए मेरी तीन दोस्त भी साथ जाया करती थीं। हम उससे डारी जबान में बात करते थे। हम चारों लड़कियों के पास फ़ोन थे। इसलिए हममें एक उसका फ़ोटो खींचती, दूसरी वीडियो बनाती और मैं तथा हादिया बातचीत को रिकॉर्ड करने का काम करते। आसपास से गुजरते लोग हमारी टोली पर नज़र डालते और एक दूसरे से कुछ कहते हुए आगे बढ़ जाते। हम अपने ऊपर उनकी निगाह महसूस करते थे। वे हम पर शायद इसलिए नजर डालते थे क्योंकि हमारे पास फ़ोन थे। मैं यह देखकर बेचैन हो जाती थी। एक बार एक लड़का हमारे पास आया और पूछने लगा कि हम क्या कर रहे हैं। वह जानना चाहता था कि क्या हम अयातुल्ला की मदद करना चाहते हैं? हमें इसका जवाब नहीं सूझ रहा था, लेकिन अयातुल्ला पर लोगों की नजरों का कोई असर नहीं था क्योंकि वह जानता था कि हम केवल उससे कुछ सवाल कर रहे हैं और उसकी जि़ंदगी के बारे में जानना चाहते हैं।
इसके बाद हम अयातुल्ला से हफ्ते में केवल एक बार मिलने लगे। हमें पता चला कि वह अपनी बीवी, एक बेटी और दो बेटों के साथ 2015 में भारत आया था। अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए वह पिछले एक साल से खिड़की में मोची का काम कर रहा है। हिंदी न जानने के कारण उसे शुरू में कई दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा। लेकिन खिड़की में उसके कुछ और रिश्तेदार भी रहते थे जिन्होंने उसकी इस आड़े वक़्त में बहुत मदद की। यहां पहुंचने के बाद शुरू में उसका परिवार एक रिश्तेदार के साथ रहा, लेकिन वह जानता था कि यह व्यवस्था थोड़े दिन ही चल सकती थी क्योंकि आखि़र में अपना घर ढूंढे बिना बात नहीं बनने वाली थी। लेकिन, घर ढूंढना बेहद मुश्किल काम था। उसने जितने घर देखे उनका किराया उसके बूते से बाहर था। ख़ैर, कुछ हफ़्तों की खोजबीन के बाद उसे एक सस्ते किराये वाला घर मिल गया। अपने घर में आते ही परिवार नयी जिंदगी की तैयारी में जुट गया। उन्हें एक साथ कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहले पानी की किल्लत आई और फिर खाने की चीजों की मंहगाई। लेकिन मानसिक तौर पर अयातुल्ला बेहद मज़बूत आदमी है। यही वजह है कि धीरे-धीरे परिवार, खिड़की और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले रिश्तेदारों की मदद से उसने सारी दिक़्क़तों पर काबू पा लिया। जल्दी ही उसकी आसपास रह रहे अफ़गानी लोगों से जान-पहचान हो गयी। उन्होंने अयातुल्ला को अस्पताल और बाजार जैसी जगहों की जानकारी दी। चूंकि वह हिंदी या अंग्रेजी, कोई भाषा नहीं जानता था, इसलिए ये लोग उसे अफगानी दुकानों पर भी लेकर गए ताकि भाषा न जानने का टंटा ही ख़त्म हो जाए।
दिल्ली पहुंचने के बाद परिवार द्वारा बचा कर रखा गया पैसा ख़त्म हो गया। अयातुल्ला को कोई काम नहीं सूझ रहा था। वह फिक्र में डूबा था अब उसके परिवार का क्या होगा। उसने अपने दोस्तो से कुछ पैसे उधार लिए, लेकिन परिवार के गुजारे के लिए यह रक़़म नाकाफ़ी थी। आख़िर उसे हर महीने किराया भी देना होता था। अयातुल्ला दुखी रहने लगा। अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे उसके दो बेटों ने भरोसा दिलाया कि वे उसकी मदद करेंगे। लेकिन अयातुल्ला जानता था कि दोनों बेटो पर भी घर-बार चलाने की ज़िम्मेदारी थी और उनकी आर्थिक स्थिति ख़ुद ही अच्छी नहीं थी। इसलिए उसने फ़ैसला किया कि वह ख़ुद ही कोई काम ढूंढेगा और परिवार की रोज़मर्रा की जरूरतों को अपने दम पर पूरा करेगा। अफ़ग़ानिस्तान में उसे बतौर मिस्त्री काम करने का तजुर्बा था। लेकिन उम्र के कारण खिड़की में उसे कोई काम देने के लिए तैयार नहीं हुआ। फिर, न उसे हिंदी आती थी और न ही उसे दिल्ली के वाहनों की जानकारी थी।
इस सबके चलते अयातुल्ला तनाव में रहने लगा था। फिर एक दिन उसने सड़क के किनारे एक मोची को बैठे देखा। सड़क पर आते-जाते लोगों की भीड़ से बेख़बर वह चुपचाप अपना काम कर रहा था। मोची को देखकर उसे याद आया कि जूतों की मरम्मत का काम तो वह भी जानता है। लड़कपन के दौरान अयातुल्ला की मां ने उसे बाक़ायदा सिखाया था कि जूतों की मरम्मत कैसे की जाती है। और अयातुल्ला ने यह काम बहुत अच्छे से सीखा था। लिहाजा उसने फैसला किया कि वह इलाके में मोची का काम शुरू करेगा। वह इस शुरूआत पर ख़ुश था, लेकिन वह यह भी जानता था कि इस काम के लिए उसे औज़ारों की जरूरत पड़ेगी। समस्या यह थी कि उसे औज़ार ख़रीदने की जगहों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए वह अपने एक ख़ास दोस्त के पास मदद लेने पहुंचा। दोस्त ने बताया कि मोची के काम के लिए उसे जिन औज़ारों की ज़रूरत है, उन्हें पुरानी दिल्ली के बाज़ार से काफ़ी सस्ते दाम पर खरीदा जा सकता है। अयातुल्ला अपने दोस्त के साथ जाकर औज़ार ख़रीद लाया। उसने अपना ठीहा जूस वाली गली के कोने पर जमाया। यह गली ख़ासी भीड़-भाड़ वाली थी और उसके घर के पास पड़ती थी। अयातुल्ला ने इस जगह को बुहार कर चकाचक कर दिया। दीवार पर जूतों के फीते टांग दिए और सामने बक्से क़रीने से रख दिए। काम के बाद ग्राहकों के जूते वह इन्हीं बक्सों में रखकर घर ले जाता था।
आसपास के लोगबाग कुछ ही समय बाद अयातुल्ला के काम के मुरीद हो गए। वह लोगों के साथ बर्ताव भी अच्छा करता था और अपना काम भी पूरी लगन से करता था। जूतों की मरम्मत के लिए लोगबाग उसके पास नियमित रूप से आने लगे। उसे अपना काम अच्छा लगने लगा। आज वह हर दिन 200 से 300 रूपये कमाता है। लेकिन यह रक़म घर की जरूरतों- सब्जी और फल आदि ख़रीदने पर ही ख़र्च हो जाती है। इतनी सीमित कमाई पर जि़ंदा रहना बहुत मुश्किल होता है। दूसरे लोगों की तरह उसके परिवार के सदस्य भी अच्छा भोजन करना चाहते हैं और चीज़ें ख़रीदना चाहते हैं, लेकिन वह संभव नहीं हो पाता। घर का किराया तो उसके अफ़ग़ानिस्तान में काम कर रहे बेटे भेज देते हैं, लेकिन परिवार के भोजन की व्यवस्था उसे ख़ुद करनी पड़ती है।
अयातुल्ला की बेटी उन्नीस साल की है। वह अपनी पढ़ाई पर बहुत मेहनत कर रही है ताकि पढ़ाई के बाद उसे कहीं नौकरी मिल जाए और वह अपने अब्बू की मदद कर सके। उसका दूसरा बेटा भी पढ़ाई कर रहा है। लेकिन अयातुल्ला नहीं चाहता कि उसकी बेटी कहीं बाहर जाकर नौकरी करे। वह चाहता है कि उसकी बेटी पढ़-लिख कर अपना काम शुरू करे, अपना ऑफ़िस बनाए और भविष्य में अपने परिवार के साथ सुख से जीये। अयातुल्ला के परिवार की सबसे बड़ी भावनात्मक समस्या यह है कि उनका दूसरा बेटा अमानुल्ला जन्म से विकलांग है। वह बत्तीस साल का है, लेकिन वह बोल नहीं पाता और उसकी नज़र भी बेहद कमज़ोर है। अयातुल्ला से अपने बेटे का यह रोज़-रोज़ का दुख नहीं देखा जाता।
मुझे अयातुल्ला किसी भी अन्य आदमी की तरह ख़ुशपोश दिखाई देता है। वह हमेशा मुस्कुराता रहता है। उसे देखकर लगता है कि जैसे वह जीवन का आनंद ले रहा है। उसकी इस छवि का एकमात्र कारण यह है कि वह अंदर से बेहद मज़बूत आदमी है। वह 76 साल का हो चुका है। इस उम्र में कोई भी आम आदमी घर पर आराम करना चाहता है। वह चाहता है बच्चे काम करे और वह घर पर आराम करे। लेकिन, अयातुल्ला एकदम अलग मिज़ाज का आदमी है। वह अपने बेटे-बेटी की ख़ातिर अब भी काम करता है ताकि वे अपनी पढ़ाई पूरी करके बेहतर जिंदगी जी सकें। वह बेहतर जि़ंदगी की चाहत में भारत आया था लेकिन यहां उसे कई दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा। खिड़की में रहने वाले बहुत से लोगों की यही हालत है। मैं ऐसे लोगों को ढूंढती रहती हूं और उनसे बात करना चाहती हूं। शायद उन लोगों की जि़ंदगी भी अयातुल्ला जैसी दिलचस्प हो…


A Stranger No More

Sabra |

I was just 9 years old when we came to India from Afghanistan. I really don’t really remember that much about my early life there. My father and my uncle didn’t allow me to go beyond our house because of kidnappers in our city Kabul. I wanted to play with my friends outside on the street but I couldn’t. My brother, cousin and I always played together in our yard. So I mostly remember our yard, and the way to school.

There was a police station right opposite our house. The police were very kind to us. They always gave us candies, but my uncle didn’t want us to talk to them. Once I had some money saved from my pocket money, on a day my father and uncle were not home, so it was a good chance to go out. I told my cousin and brother, “Let’s go and eat ice cream!” and they accepted. It was the first time we went out of the house without permission. We were enjoying it, but suddenly a policeman called us over and started talking to us, asking how we are and what is going on in our house. I was really scared that my father or uncle might come home and find us on the street, because I knew they would be so angry that they would almost kill us. Suddenly I saw my uncle, and I screamed to warn my brother and cousin. My uncle heard me, and saw us with the policeman. He ordered me to go home, and then he beat my brother and cousin so much that their face and body was covered with red welts. After that we never tried to leave the house without permission.

There are many Afghan families living and working here in Khirkee. I noticed an Afghan cobbler, he looked very old, his hair was totally white and he talked very slowly, but he still worked hard all day – sitting on the crowded road in hot weather, trying to earn some money. Before coming to India I had never talked to strangers, or tried to learn how other people live. But I really wanted to know more about him, so I went to him and asked some questions about his life, and he kindly answered.

His name is Ayatolla, and he is 76 years old. At first three of my friends went with me, visiting him every day. We spoke in Dari. We four girls all had phones, so one of us took photos, another took video, and Hadiya and I talked to Ayatolla and recorded the conversation. People passing by saw our group, and made comments to each other. We felt their eyes on us, probably because of the phones. This made me uncomfortable, and one boy came up and asked us what we were doing, did we want to help Ayatolla by giving him a donation…? We were confused, but Ayatolla was not bothered by the public attention because he knew we were just there to ask some questions and learn about his life.

After that we went to talk to Ayatolla just once a week. We learned that he came to India from Afghanistan with his wife, daughter and two of his sons in 2015. He has been working as a cobbler in Khirkee for one year to earn money for his family. At first they faced many problems, especially as they did not know Hindi at all. But he had some relatives in Khirkee, and they helped him a lot. The family stayed with a relative after their arrival, but Ayatolla knew this could only be for some time, and that he had to find a house for his family. This was a real struggle because he could not afford the rents. After some weeks he found a house with cheaper rent, and the family moved there to begin their new life. They had water problems, food was very expensive, and there were other difficulties. But Ayatolla is mentally very strong, and that is how he slowly solved all his problems, with the help of his family, relatives in Khirkee and also in Afghanistan. Within a very short time he became friends with many Afghans in the neighbourhood, and they also helped him. They showed him the hospital and the markets, and because he could not speak Hindi or English, they took him to the Afghan shops where language was not an obstacle.

The family’s savings were used up one month after their arrival. Ayatolla had no idea what to do or how they would survive. So he borrowed some money from his friends, but that was not enough to live on as he had to pay rent. He became very sad. His two married sons working in Afghanistan told him not to worry as they would send some money, but he knew that his sons themselves did not earn much, so they could not really help him. So he decided to find some work himself and earn enough for the family’s daily needs. He had worked as a mechanic in Afghanistan, but in Khirkee no one would hire him because of his age, because he did not know Hindi, and because he had no experience with local vehicles.

All this made Ayatolla very tense. Then one day he saw a cobbler sitting on the roadside, calmly working while people walked past him. This sight reminded Ayatolla that he too knew how to fix footwear. His mother had taught him to repair his own shoes as a teenager, and he had learnt the skills very well. He decided that he too would try to work as a cobbler in the locality. Happy with this new idea, he realized he would need tools but did not know where to get them. He went to his best friend and asked for help. The friend told Ayatolla that whatever he would need as a cobbler could be bought more cheaply in Old Delhi markets, and went there with him to buy the tools. Ayatolla prepared his work items and positioned himself on the corner of ‘juice gali’, a crowded lane near where he lives. The chosen spot looked beautiful after he cleaned and decorated it, hung colourful shoelaces on the wall behind him, and arranged boxes in which to take the customers’ shoes home at night.

After some time people got to know Ayatolla as someone who was very kind and did his job very well, and came regularly to get their footwear fixed. He began to love his work. Today he earns Rs 200-300 daily, which is only enough for some vegetables and fruits for the family. It is very difficult to survive on so little. Like other people, his family also wants to eat well and buy things, but that just is not possible. But he has to keep working so that they can at least buy food, and he pays the rent with money his two married sons send from Afghanistan.

Ayatolla’s daughter is 19 years old. She is studying very hard in order to be able to help her father by getting a job somewhere. His other son is also studying. But he does not want his daughter to work for others. He wants her to finish her studies and work for herself, have her own office and live a good life with her family in the future. The problem that has emotionally broken Ayatolla’s family is the condition of his 32-year-old son Amanollah who is seriously disabled since birth, and has speech defects and poor eyesight. Doctors cannot do anything for him, and neither can Ayatolla. It breaks his heart to see his big son struggling day after day.

To me, Ayatolla looks as happy as anyone else, always smiling and seeming to enjoy his life. The only reason he can present himself like this is because he is mentally so strong. He is 76 – other people his age stay home and let their children support them. But Ayatolla is different. He works for his son and daughter, so they can complete their studies and build their futures. He came to India with hopes for a better life, but here too he faced many problems. This is the case with many people in Khirkee, and I want to find them and talk to them as well. Their stories might be as interesting as Ayatolla’s…

I never thought a man can be that broken inside. he looked as happy as other people to me. Always smiling and enjoying his life but the only reason behind his happiness was that he is strong. He is 76 now! others on this age stay home and let their son and daughter work. But ayatollah is different he works for his son and daughter so they can complete their studies and make their future better. He come with hope for better life to india but here he faced problems also. I understood most people also have problems in there life, same as ayatollah and i want to find them as well. They might be as interesting as ayatollahs.

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