आजादी कहां से आती है?

नरगिस |

इस धरती पर जिंदा रहने के लिए हर आदमी को कोई न कोई काम करना पड़ता है। आदमी की यह सबसे अहम ज़रूरत होती है। कुछ लोग अपना काम उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद शुरू करते हैं, कुछ हाई स्कूल के बाद शुरू कर देते हैं और बहुत से औपचारिक शिक्षा के बग़ैर ही काम पर लग जाते हैं।

अफ़ग़ानिस्तान में मेरे अब्बू ने अपने लड़कपन में हाई स्कूल पास किए बिना ही काम शुरू कर दिया था। एक पीढ़ी के बाद मेरे बड़े भाई ने भी यही रास्ता अख़्त्यिार किया। परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए ऐसा करना जरूरी था। लेकिन, मुझे उनसे यह जानने का मौका नहीं मिल पाया कि उन्होंने अपनी पढ़ाई अधूरी क्यों छोड़ दी थी और उनके सामने ऐसी कौन सी मुश्किलें आईं थीं कि उन्हें इतनी कम उम्र में काम शुरू करना पड़ा। वे मेरी बात पर चुप लगा जाते थे। वे शायद मुझे यह सोचकर कोई बात नहीं बताने चाहते थे कि कहीं उनकी बात सुनकर मैं दुखी न हो जाऊं। लेकिन मैं उनकी आंखे देखकर सब जान गयी थी कि अपनी जि़ंदगी में उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। दरअसल, आदमी की आंखें उसकी हर कहानी बयान कर देती हैं।

यहां, दिल्ली में आसिफ भाई से उनकी आपबीती सुनने से पहले मैं यह सोचा करती थी कि कम उम्र में काम शुरू कर देने वाले लोगों को मेरे भाई और अब्बू की तरह संघर्ष करना पड़ता होगा। लेकिन उनसे बात करने के बाद मुझे पता चला कि काम के मामले में हर आदमी की क़िस्मत अलग होती है।

आसिफ भाई की उम्र तीस साल है। वे हौज़ रानी में पिछले दस सालों से रह रहे हैं। पहले वे ओखला में रहा करते थे। परिवार की मदद करने के लिए उन्हें बारहवीं करने के बाद पढ़ाई को अलविदा कहना पड़ा। सबसे पहले उन्होंने वोडाफोन के ऑडिट विभाग में काम किया। यहां उन्हें नौकरी के दौरान बचाए गए पैसों से अपनी ख़ुद की मोबाइल फोन शॉप खोलने का ख़्याल आया। जगह की तलाश में उन्होंने हौज रानी का रुख किया। आसिफ भाई जानते थे कि उनके पास दुकान ख़रीदने लायक पैसे नहीं हैं, लेकिन इन पैसों से वे छोटामोटा बिजनेस शुरू कर सकते हैं। उन्होंने एक दुकान किराए पर ली और बेसिक मोबाइल (नोकिया और सैमसंग) के साथ मोबाइल की एक्सेसरीज़ बेचने के अलावा जिओ, वोडाफोन, एअरटेल और आइडिया की रिचार्जसेवा शुरू कर दी।

आसिफ भाई को वह दुकान चलाते हुए अब नौ साल हो चुके हैं। वे अपनी दुकान पर सुबह 11.30 से रात 10.30 तक काम करते हैं। उनके ग्राहकों में लगभग साठ फ़ीसदी मर्द और चालीस फ़ीसदी महिलाएं हैं। लेकिन आसिफ भाई सभी ग्राहकों पर बराबर का ध्यान देते हैं। उनके यहां ज़्यादातर ग्राहक शाम 5 बजे से 10 बजे के बीच आते हैं क्योंकि अंधेरा होने के बाद दिल्ली की सड़कें औरतों के लिए असुरक्षित हो जाती हैं। उनके यहां देर शाम और रात के समय आने वाले ग्राहकों में मर्दों की संख्या ज़्यादा होती है। उनकी दुकान पर अधिकांश महिलाएं शाम 5 बजे से 7 बजे के बीच आती हैं।

आसिफ भाई के शब्दों मेंः ‘जब मैंने यहां अपनी दुकान शुरू की तो मुझे बाक़ी दुकानदारों की तरफ़ से कोई परेशानी नहीं हुई। मेरे आजूबाजू एक मिठाई और दूसरी केमिस्ट की दुकान है। इस गली में मोबाइल रिचार्ज की एक भी दुकान नहीं है। इन तमाम बरसों में मेरी किसी के साथ कोई बहसबाजी नहीं हुई। इस मामले में हौज़ रानी में स्टेशनरी की दुकान करने वाले मेरे दोस्त का तजुर्बा थोड़ा कड़वा रहा है। वह जिस गली में दुकान करता है उसमें स्टेशनरी की एक और दुकान है। इस कारण दूसरे दुकानदार के साथ उसकी कहासुनी होती रहती है। मेरी गली में मेरा कोई प्रतिद्वंवदी नहीं है, इसलिए आसपास के दुकानदारों से मेरे अच्छे रिश्ते हैं। हम एक दूसरे के काम में दख़ल नहीं देते और न ही एक दूसरे को बुराभला कहते हैं। हम सब सिर्फऱ् अपने काम से मतलब रखते हैं। मेरे पास इतना ज़्यादा काम रहता है कि फालतू की बातें करने का वक़्त ही नहीं रहता’।

शुरूशुरू में मुझे ग्राहक बनाने में ज़रूर परेशानी हुई। मेरी दुकान नयीनयी शुरू हुई थी इसलिए इलाक़े के लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी। बिजनेस भी मंदा चलता था, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैं हर दिन आकर दुकान खोलता और लोगों को इस बारे में बताता। मैंने अपनी दुकान के बारे में अपने तमाम दोस्तो को फ़ोन पर मैसेज भेजे और उनसे गुज़ारिश की कि वेइन मैसेजों को अपनेअपने दोस्तो को फॉरवर्ड कर दें। मैंने इस बारे में अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर भी जानकारी शेयर की। एक बार जब ग्राहक मेरी दुकान पर आने लगे तो मैंने उन्हें बेहतर से बेहतर सेवा देने की कोशिश की। इसका नतीजा यह हुआ कि न केवल मेरे ग्राहक पक्के होते गए बल्कि उन्होंने अपने तजुर्बे के बारे में और लोगों को भी बताया’।

मेरे पास यहां रहने वाले तमाम तरह के लोग आते हैं। इन ग्राहकों में भारतीय, अफ़गानी, सोमाली और नाईजीरिया के भी लोग हैं। उनमें कुछ ग्राहक बुरा व्यवहार भी करते हैं, लेकिन मैं इस सब पर ध्यान नहीं देता। मेरा एक ग्राहक रिचार्ज में ज़रा सी देरी होते ही चिल्लाने लगता था कि इसमें ‘इतनी देर क्यों लग रही हैमैं’। मुझे ऐसे लोग बुरे लगते हैं। अपने पुराने ग्राहकों को मैं 10 प्रतिशत का डिस्काउंट देता हूं। लेकिन, जहां तक उधार देने की बात है तो मैं उन्हीं लोगों को उधार देता है जो मेरा पैसा समय पर चुका देते हैं। मुझे ऐसे लोगों पर बहुत ग़ुकुस्सा आता है जो मेरा पैसा समय पर नहीं चुकाते’।

परिवार का ख़र्च चलाने के लिए मैं ठीकठाक कमा लेता हूं। इससे मकान का किराया भी निकल आता है। लेकिन बचत के नाम पर मेरे पास लगभग कुछ नहीं बचता। एक तरह से मैं ख़ुश क़िस्मत था कि मैंने सही वक़्त पर दुकान खोल ली क्योंकि उस समय पूरे इलाक़े में नोकिया और सैमसंग के बेसिक फोन तथा रिचार्ज की सुविधाओं वाली केवल दोतीन दुकानें थीं। पिछले कुछ बरसों में यहां की आबादी दुगनी हो गयी है। आज खिड़की और हौज रानी इलाक़े की हर गली में मोबाइल फोन और रिचार्जिंग की दुकानें खुल चुकी हैं। इसे देखकर कभीकभी मैं असुरक्षित महसूस करने लगता हूं। लेकिन फिर इस स्थिति को मैं यह सोचकर स्वीकार कर लेता हूं कि क़िस्मत का लिखा कोई नहीं टाल सकता।

दुकान में जब मेरे पास ख़ाली वक़्त होता है तो मैं मोबाइल और सोशल मीडिया पर वक़्त बताता हूं। लेकिन मोबाइल फोन की रिपेयरिंग सीखने के लिए मैं यूट्यूब पर वीडियो भी देखता हूं। मैंने केवल इन वीडियो को ग़©र से देखकर और उनके दिशानिर्देशक सुनकर अपना फोन ठीक कर लेता हूं। मेरे लिए ऐसे वीडियो मुफ्त की शिक्षा जैसे हैं जिनके जरिये मैं नयीनयी बातें सीखता रहता हूं। नयी चीजें सीखने से मेरा अपनी सलाहियत पर भरोसा बढ़ता है और मुझमें आत्मनिर्भर होने का एहसास पैदा होता है।

मैं जब छोटा था तो हमेशा यह सोचा करता था कि मेरे हमउम्र लोग कड़ी मेहनत करके आज़्ाादी हासिल कर सकते हैं। लेकिन, आज जब मैं इस बारे में सोचता हूं तो मुझे लगता है कि तमाम शैक्षिक काबिलियत, लगन और प्रतिभा के बावजूद यह कर पाना इतना आसान नहीं होता। मैंने अपनी जि़्ांदगी के तजुर्बों से यही सीखा है कि कोई भी आदमी अपने काम के मामले में चुनौतियों का सामना करके और ख़ुद को बदलती हुई परिस्थितियों के हिसाब से ढाल कर ही आज़्ा ादी हासिल कर सकता है।


What makes you independent?

Nargis |

Every person on this earth needs work in order to live. This is the most important human need. Some people start working after finishing their higher education, some people start working after high school, and many people work without having any formal education at all.

Back in Afghanistan, my father had started working as a teenager, without finishing high school. A generation later, my elder brother did the same. This was necessary in order to help their families financially. But I did not get the chance to learn why they had discontinued their studies and what difficulties they faced when starting work at such a young age. They were silent about it, not wanting to share, thinking it would upset us. But I just had to look into their faces to know how much they had struggled – one’s eyes are enough to tell one’s story.

Before talking to Asif Bhai here in Delhi about his life-story, I used to think that everyone who starts working at an early age has to struggle a lot, like my father and brother. But through my talks with him I came to understand that when it comes to work, everyone has a different destiny.

Asif Bhai is 30 years old, and has been living in Hauz Rani for the past ten years. He earlier lived in Okhla. After completing his 12th Standard he stopped his studies because he needed to contribute to the family income. He first worked for one year in the audits department of Vodafone. This gave him the idea of opening his own mobile phone shop with the money he had managed to save from his salary. He moved to Hauz Rani, knowing that his savings were not enough to buy a shop but he could invest in building a small business. He took a shop on rent and started selling basic mobiles (Nokia and Samsung), all mobile accessories and recharge services for different kinds of sim cards (Jio, Vodafone, Airtel and Idea).

Asif Bhai has been running this shop for nine years now. It is open to everyone, and he works from 11.30 am to 10.30 pm. He has a mix of male (60%) and female (40%) customers, and pays equal attention to all. Most customers come to the shop between 5 pm and 10 pm. Most women come between 5 pm and 7 pm, because the streets of Delhi are especially unsafe for women after dark. In the late evening and at night the customers are mainly men.

In Asif Bhai’s own words:

“When I opened my shop I did not face any major problem with the other shopkeepers here. My neighbours here are a sweets shop and chemist, and there is no other mobile phone or recharging shop in this lane. It has been good all these years, no arguments. Unlike the case of one of my friends who has a stationery shop in Hauz Rani. There is another stationery shop in the same lane so he has to cope with conflict and back-biting. In my location I have no rivals so I continue to have a good relationship with the shopkeepers around me. We don’t interfere with each other’s work or criticize each other. All of us mind our own business, and there is no time for idle chat because we are busy with our daily workload.

“Initially I did have a problem about how to build my customer base. My shop was new and no one in the locality was really aware of it. Business was very slow but I did not give up. I continued to be at the shop every day, but also spread the word through socializing and communicating. I texted all my friends about my shop and asked them to forward the texts to all their friends. I posted the information on my social media accounts. I also shared the information with my relatives and my neighbours. Then when customers actually started coming to my shop I gave them the best possible service, so they have kept returning to me and have told other people about their satisfactory experience.

“I serve all kinds of customers from the local communities – Indians, Afghans, Somalis, Nigerians. Some of them can be rude, but I don’t pay much attention to abusive behaviour. One customer would get angry if the recharge process was even slightly delayed; he would always start shouting, “Why is it taking so long…!” I have a low opinion of people like that. To my trusted regular long-term customers I give a 10% discount. But I only extend credit to people who pay me back on time. It makes me really angry when people are careless about this and owe me money.

“I earn enough money to help my family and pay the rent, but I can hardly save anything. I was lucky to open the shop when I did, because at that time the locality had only two or three shops selling basic Nokia and Samsung phones and providing recharge services. In the last few years the population here has doubled, and now in every lane of Khirki and Hauz Rani you can find mobile phone/recharging shops. This makes me feel insecure sometimes, but I accept the situation because no one can avoid whatever is in their fate.

“When I have free time in my shop I use my mobile to pass time and check my social media accounts. But I also watch videos on YouTube to train myself in mobile phone repair. I have been able to fix my own mobile just by closely watching and following the instructions. The videos are a form of free education and my new skills add to my self-belief and self-reliance.

“When I was young I always thought that all people of my age had the capacity to gain independence through hard work. But now when I think about it, I feel it is not that simple, even if you have the educational qualifications, the commitment and the talent. My own life experience has taught me a person really becomes independent in terms of their work only through being ready to take up challenges and to adapt to changing scenarios.”

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