Nitin |

This episode took place during the Navratras. I was watching TV at home when I got a phone call from my friend. He said, “Brother, we are going out, do you want to join us?” I asked, “Where are you going?” My friend said, “It is Navratra, so definitely we’ll go to the Kalkaji temple.” I glanced at my father, and then said, “No, I am not coming.” My father asked, “Who called you?” I said, “It’s nothing, just my friend wanting to know if I will be going for tuition tomorrow or not.” My father said, “All right.” I was relieved because I had thought he would question me further, but he did not. I was afraid of his questions because I had lied to him. Ten minutes later I called my friend and said, “Brother, I’ll come with you all to Kalkaji.” He said, “But just now you told us you wouldn’t and now you are saying you will.” I said, “How was I to know that my father would be sitting right there!” I call my father ‘Home Minister’ because
he runs the whole house. Then I asked my friend what time we were meeting. He said, “At 1 a.m. – at that time there are no police around, nor is there any traffic.” This is generally correct. After talking to my friends I had dinner and went off to sleep, because I knew we would be staying awake and enjoying ourselves all night. My friends called me at 12.45 a.m. and told me to come down and out of the house. Suddenly I realized this might be very difficult. I had never done this sort of thing before, and if my father found out he would really thrash me. But I pushed the thoughts away, very quietly unlatched the front door and went downstairs without making a sound. We brought out our motorbikes and scooties and rode off towards Kalkaji. On the Chiragh Dilli road we saw a police patrol and became uneasy, but kept our nerve and went past that area. When we reached Kalkaji temple we saw a very long queue. But being guys we were able to push our way into the line for darshan. As we got ready to leave the complex, one friend said, “Brothers, there are police around here and if they catch us they will beat us up very badly.” We said to him, “What are you afraid of?” He said, “You have no idea, this happened to me once. Since then I don’t take my bike onto the main roads.” We said, “This is not going to happen to you again and again.” Silenced, he said, “Okay, it doesn’t matter. Let’s go.” It was about 3.30 a.m. when we left. We were riding homewards when the police patrol stopped us. One friend who was an expert biker sped ahead and got away. But I was riding pillion with a friend who could not really handle the bike well. The police grabbed me and five other friends and asked, “Do you have li
censes?” etc. The friend I was riding with had no documents. The police made us squat in murgha posture. Then they slapped us a few times, beat us a few times with their canes, and told us to call our families. But we had all sneaked out for our joyride. If we called our homes now, the police beating would be nothing compared to what we would get from our families. We all fell at the feet of the police and apologized, but they would not listen to our pleading. Then a decent policeman arrived. He was an SHO (Station House Officer). He told the patrol, “Let these kids go.” I don’t know his real nature, but he somehow understood our situation. I haven’t forgotten the beating I got from those policemen. A fear of them has been planted within me.


नितिन |

यह बात उन दिनों की है जब नवरात्रे चल रहे थे। मैं अपने घर में टीवी देख रहा था, तब मेरे दोस्त का फ़ोन आता है और वह मुझे बोलता है कि भाई घूमने चल रहा है तो मैंने पूछा, कहा घूमने जाना है। तब दोस्त ने बोला कि नवरात्रे चल रहे हैं तो कालकाजी ही जायेंगे। फिर मैंने अपने पापा की ओर देखा और बोला कि मैं नहीं आ रहा। फिर मेरे पापा ने मुझसे पूछा कि किसका फ़ोन था तो मैने कहा कि कुछ नहीं- मेरे दोस्त का फोन था और वह मुझसे पूछ रहा था कि मैं कल ट्यूशन आऊंगा या नहीं तो पापा ने बोला, अच्छा। जब पापा ने ‘अच्छा’ बोल दिया तो मेरे दिल को आराम मिला क्योंकि मुझे लगा कि पापा पता नहीं अब कितने सवाल करेंगे, पर ऐसा नही हुआ। मुझे अच्छा लगा कि पापा ने कोई सवाल नहीं किया क्योंकि मैंने पापा से झूठ बोला था कि मेरे दोस्त ने ट्यूशन के लिए फ़ोन किया है। पापा से बात करके मैंने 10 मिनट बाद अपने दोस्त को कॉल किया और मैने बोला कि भाई मैं भी चलूंगा साथ में कालकाजी। मेरे दोस्त में बोला कि अभी तो तूने मना किया और अब जाने की बोल रहा है। उसे क्या पता था कि उस वक़्त मेरे सामने मेरे पापा थे जिनको में होम मिनिस्टर बुलाता हूं क्योंकि पापा ही पूरे घर को चलाते हैं। फिर दोस्तों को मैंने टाइमिंग का पूछा तो उन सबने रात के 1 बजे का टाइम बोला क्योंकि रात को न पुलिस वाले होते हैं और न ही ट्रैफिक। ऐसा हम सबको लगता था। फिर मैं दोस्तों से बात करके खाना खाकर सोने चला गया क्योंकि हम सबको पूरी रात जागना था और मस्ती भी करनी थी। मेरे पास मेरे दोस्तों का कॉल आता है रात 12.45 पर और वे बोलते हैं कि घर के नीचे आ जा, पर मुझे पता है कि कितना मुश्किल है मेरे लिए ये सब, क्योंकि मैंने आज से पहले ऐसा कुछ नहीं किया था और पापा को पता चल गया तो वह मुझे बहुत मारेंगे। पर मैंने इन सब बातों को छोड़कर चुपचाप अपने घर की कुण्डी खोली और बिना शोर किए मैं घर के नीचे चला गया। फिर क्या- मैं और मेरे दोस्त सबने अपनी बाइक और स्कूटी निकली और कालकाजी जी के लिए चल दिए। जब हम चिराग दिल्ली की सड़क पर जा रहे थे, तब हम सबको पुलिस वाले दिखे और हम सब घबरा गए पर हम सब हिम्मत करके वहां से निकल गए। जब हम कालकाजी मंदिर पहुंच गए तो वहां बहुत लंबी लाइन लगी थी। पर हम भी लड़के थे- हम सब दोस्त लाइन के बीच में घुस गए कालकाजी के दर्शन के लिए। जब हम वहां से निकलने के लिए रेडी हो रहे थे, तभी एक दोस्त ने बोला कि भाइयों पुलिसवाले हैं वहां पर और अगर उन्होंने पकड़ लिया तो बहुत मारेंगे। उस दोस्त को हमने बोला कि इतना क्यों डरता है पुलिस वालों से तो उसने बोला कि भाइयों तुम्हें नहीं पता एक बार बहुत मारा था मुझे उन्होंने। उस दिन से मैं कहीं नहीं जाता अपनी बाइक लेकर मेन रोड पर। हमने उसे समझाया कि ऐसा तो एक ही बार हुआ होगा। अचानक से तब वह बोला कि कोई बात नहीं। अब चलते हैं और फिर हम सब वहां से सुबह 3.30 बजे निकल गए। सब घर की ओर आ रहे थे तभी हम सबको पुलिस वाले रोकने लगे। पर जो बाइक चलाने में अच्छा था, वह पुलिस के हाथ नहीं लगा। पर मैं जिस बाइक पर बैठा था, उसे अच्छी तरह बाइक चलानी नहीं आती थी। फिर मुझे और 4-5 दोस्तों को पुलिसवालों ने पकड़ लिया और पूछा कि लाइसेंस है? बाइक की आरसी है? मेरे दोस्त के पास यह सब नहीं था तो पुलिसवालों ने हम सबको मुर्गा बनाया। फिर 2-3 थप्पड़ मारे- 2-3 डंडे मारे और बोले कि घरवालों को बुलाओ। पर हम सब तो घरवालों से छुपकर निकले थे। अगर पुलिसवालों ने घरवालों को बुला लिया तो वे और भी मारेंगे। हम सबने पुलिसवालों को पैर पकड़कर सॉरी भी बोला, पर पुलिसवाले नहीं माने। फिर एक अच्छा पुलिसवाला आया। वह एसएचओ था। उसने बोला कि छोड़ दो इन बच्चों को। वह पुलिसवाला इसीलिए अच्छा था क्योंकि उसने हम सबको छोड़ने को बोला था। वैसे पता नहीं कैसा होगा वह एसएचओ। उस दिन से मैं आज तक उन पुलिसवालों की मार नहीं भूला हूं। अभी तक मेरे अंदर पुलिस का डर है।

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