Growing with distance

Two Months ago, I started working in an Arabic restaurant which is at the Huda City Centre Metro Station. It is one of the major metro stations and connects to a lot of hospitals, restaurants and offices nearby Gurgaon. It is called Middle East Cuisine. It was my first experience of working. Also, it was difficult because I didn’t know much about counting and handling cash. In the beginning, I did lots of mistakes. Some were quite funny! At times, I ended up taking more money from the customers and sometimes it was less money. Neither did I know nor did I check the rates of the food items. When I took more money from the customers, unknowingly, they called me Money Machine! Most of our customers are from the Middle East. They speak Arabic. Dealing with them was a big task for me. I didn’t know a single word of Arabic. Now, I know the food names and also, when I am confused, I try to follow their body language.

In the first two weeks, my boss told me if I can’t manage the job, then I should leave it. But I need the job. I want to study further. This job will allow me to save some money for the University tuition fees. I already have five siblings who are studying. Only my brother and I are working. Also, I want to learn it because whenever someone told me that, “Kubra you can’t do it, leave it”, I do not feel like giving up until I prove that I can do it. Now I know that I am not perfect but I have learnt a lot and I am still learning.

This was a big change for me. I learnt how to control my fear. I am that girl who never went anywhere alone and never left her mother’s hand. I am very close to my mother. Even in Afghanistan, my mother would regularly accompany me to my school which was a stone’s throw away, but now every day I am traveling to another city alone. Daily I need to talk to different and unknown people. Working at the restaurant is quite demanding. It is better to work hard than remaining unemployed. I changed so much. I think I have grown up. I am no longer my mother’s little girl. Now I am an independent girl. During my initial days at work, I was not comfortable opening up to my colleagues even though they were friendly and tried to reach out to me. I did not know the rules well and they tried to teach me.

Working in a male only space I found it to be extremely difficult. Being the only girl in that space, I found that the boys were happy to gang up against me trying to monitor my every move. For instance, they would say, “Why are you looking at that particular man with so much interest? Are you blushing?” Nowadays, I have learnt to pull the same tricks on them. We have become friends.

I have met many unknown people from different places, having different cultures, speaking different languages. They are usually kind and they respect everyone. Out of my colleagues, most of them are Afghans and among the rest, we have five Indians and two Arabs. Previously, I was the only girl who worked at the restaurant but now, another Afghan girl has joined. I too, have a partner for gossiping now.

Most of our customers think that we are Arabs and they start conversing in Arabic. However, I don’t know a single world so I just smile and nod my head. My seniors find it funny when I nod without understanding. Whenever our customers ask for Middle Eastern specialties, we recommend Shawarma and Mqlama Meat. In our kitchen, the chefs who prepare the food are from Syria, Sudan, Afghanistan and India. This brings a variety in taste.

Working at the restaurant, I have learnt a lot about people’s preferences. Indians, for example, who visit us regularly like to order Harissa with coffee and Shawarma. The Arabs on the other hand have a huge appetite and they like to order in bulk. However, they do not stop at one bulk. It makes things difficult for us. That is why when they ask me, I try to suggest them something that is pocket friendly and that which does not lead to wastage of food. Over time, some of the customers have become our friends. However, we are to maintain strictly professional relationship with them. Ironically, this rule is applicable more to the working girls than the working boys. Truly one learns so much from one’s working environment.

दूर का राही


दो महीने पहले मैंने एक अरबी रेस्त्रां में काम करना शुरू किया। यह रेस्त्रां हुडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन पर है। हुडा सिटी सेंटर मेट्रो के चंद बड़े स्टेशनों में से एक है और गुड़गांव के अस्पतालों, रेस्त्रां और ऑफिसेज को कनेक्ट करता है। जिस रेस्त्रां में मैं काम करती हूं, उसका नाम मिडिल ईस्ट क्यूजीन है। काम करने का यह मेरा पहला अनुभव था, इसके अलावा मुझे कैश को गिनने और हैंडिल करने के बारे में भी बहुत कुछ नहीं पता था। शुरुआत में मुझसे बहुत सी गलतियां हुईं। कुछ काफी मजेदार भी थीं! कई बार मैं ग्राहकों से ज्यादा पैसे ले लेती थी और कई बार कम। मुझे न तो पता था और न ही मुझे यह पता लगाना आता था कि खाने की चीजों के दाम कैसे पता किए जाएं। जब मैं अनजाने में ग्राहकों से ज्यादा पैसे ले लेती थी तो वे मुझे मनी मशीन कहते थे! हमारे ज्यादातर ग्राहक मिडिल ईस्ट कै हैं। वे अरबी बोलते हैं, इसीलिए उनसे बात करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। मुझे अरबी का एक शब्द भी नहीं आता। अब मुझे खाने की चीजों के नाम पता हैं, फिर जब मैं कंफ्यूज होती हूं तो उनकी बॉडी लैंग्वेज समझने की कोशिश करती हूं।

शुरुआती दो हफ्तों में मेरे बॉस ने मुझसे कहा कि मैं यह नौकरी नहीं कर पाऊंगी। मुझे काम छोड़ देना चाहिए। लेकिन मुझे नौकरी की जरूरत है। मैं आगे पढ़ना चाहती हूं। नौकरी करके मैं इतने पैसे बचा सकती हूं कि यूनिवर्सिटी की फीस चुका सकूं। मेरे पांच भाई-बहन अभी पढ़ रहे हैं। सिर्फ मेरा भाई और मैं काम करते हैं। इसके अलावा मैं यह काम सीखना चाहती हूं। जब भी कोई मुझसे कहता है कि कुबरा, तुम यह नहीं कर पाओगी, तुम्हें यह काम छोड़ देना चाहिए, तो मैं वह काम एकदम छोड़ना नहीं चाहती। इसके बजाय मैं यह साबित करना पसंद करती हूं कि मैं यह काम कर सकती हूं। हालांकि मैं अभी तक इस काम में पक्की नहीं हुई लेकिन मैंने बहुत कुछ सीखा है और अब भी सीख रही हूं।

यह मेरे लिए एक बड़ा मौका है। मैंने सीखा है कि अपने गुस्से को कैसे नियंत्रित करूं। मैं वह लड़की हूं जो कभी कहीं अकेले नहीं गई थी, कभी अपनी अम्मी का हाथ नहीं छोड़ा था। मैं अपनी अम्मी के बहुत करीब रही हूं। अफगानिस्तान में भी मेरी अम्मी हमेशा मुझे स्कूल छोड़ने जाती थीं, जबकि मेरा स्कूल मेरे घर के बहुत पास था। लेकिन अब मैं एक दूसरे शहर में हर रोज अकेले ट्रैवेल करती हूं। रोजाना मुझे अलग-अलग और अनजान लोगों से बातचीत करनी पड़ती है। रेस्त्रां में काम करना वैसे भी बहुत डिमांडिंग काम है। पर बिना काम के रहने से अच्छा है, जी तोड़कर काम करना। मैं बहुत बदल चुकी हूं। मुझे लगता है कि मैं बड़ी हो गई हूं। मैं अब अपनी अम्मी की छोटी सी गुड़िया नहीं रह गई। मैं एक आत्मनिर्भर लड़की हूं। काम के शुरुआती दिनों में मैं अपने साथ काम करने वालों से बात करने में हिचक महसूस करती थी, हालांकि उनका व्यवहार दोस्ताना था। वे मुझसे बात करने की कोशिश करते थे। मैं रेस्त्रां के नियमों को नहीं जानती थी और वे मुझे सिखाने की कोशिश करते थे।

दरअसल लड़कों के साथ काम करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। रेस्त्रां में मैं अकेली लड़की थी- मुझे महसूस होता था कि इकट्ठा होकर मेरे हर कदम पर नजर रखने में लड़कों को मजा आता था। जैसे वे मुझसे पूछते- उस आदमी को ऐसे क्यों देख रही हो? अरे, तुम तो शर्माने लगीं? अब मैं भी उनके साथ ऐसा ही करती हूं। और, अब हम दोस्त बन गए हैं।

यहां मुझे बहुत से अनजान लोगों से मिलने का मौका मिला है। अलग-अलग संस्कृतियों वाले, जो अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं। आम तौर पर वे लोग सज्जन होते हैं और दूसरों का सम्मान करते हैं। रेस्त्रां में काम करने वाले ज्यादातर लोग अफगान हैं, पांच भारतीय हैं और दो अरब। पहले यहां मैं अकेली लड़की थी, अब एक और अफगान लड़की भी काम करती है। अब मेरे पास भी गपशप करने के लिए एक दोस्त है।

हमारे ज्यादातर ग्राहक सोचते हैं कि हम अरब हैं और हमसे अरबी में बात करते हैं। चूंकि मैं उनकी बात नहीं समझ पाती इसलिए सिर्फ मुस्कुराती और सिर हिलाती हूं। जब मैं ऐसा करती हूं तो मेरे सीनियर हंसते हैं कि मैं बिना समझे सिर हिलाती हूं। जब भी कोई ग्राहक मिडिल ईस्ट के खाने के बारे में पूछता है तो मैं शवरमा और मकलामा मीट के बारे में बताती हूं। हमारी किचन में खाना पकाने वाले शेफ्स सीरिया, सूडान, अफगानिस्तान और भारत के हैं। इससे हमारे व्यंजनों के स्वाद में वैरायटी है।

रेस्त्रां में काम करके मैंने लोगों की पसंद के बारे में जाना है। जैसे हमारे रेस्त्रां में आने वाले भारतीय ज्यादातर कॉफी और शवरमा के साथ हरिसा ऑर्डर करते हैं। दूसरी तरफ अरब लोग खूब खाते हैं और बहुत सारे व्यंजन एक साथ मंगाते हैं। एक बार के बाद दूसरी बार भी बहुत सारा खाना मंगाते हैं जिससे हमारे लिए मुश्किल हो जाता है। इसलिए जब वे मुझसे पूछते हैं तो मैं ऐसा खाना बताती हूं जो पॉकेट फ्रेंडली भी हो और खाना भी बर्बाद न हो। कुछ ग्राहक तो हमारे दोस्त भी बन गए हैं। पर हम उनसे पूरी तरह से पेशेवर व्यवहार करते हैं। हां, यह विडंबना ही है कि यह बात ज्यादातर कामकाजी लड़कियों पर लागू होती है- लड़कों पर नहीं। बेशक, हम अपने काम के माहौल से बहुत कुछ सीखते हैं।

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