रेस्त्रां ग्रीन लीफ

तबस्सुम, विधि और मैं जिस रेस्त्रां में गए, उसका मालिक हमसे ही सवाल पूछने लगा। उसने हमारे किसी सवाल का जवाब तो दिया नहीं, इसलिए हम वहां से आ गए। हमने कई बार कोशिश की। मुझे लगता है कि चूंकि हम लड़कियां हैं इसलिए उसने हमारे सवालों के जवाब नहीं दिए। एक दिन हम फिर से वहां गए। तब वहां कोई दूसरा आदमी था। उसने हमसे कहा, ‘मैं तुम्हारे सवालों के जवाब क्यो दूं? मैं नहीं जानता कि तुम लोग कौन हो और कहां से आए हो।’ यह सुनकर हमने अपना मन बदल लिया और हमें असली बात पता चल गई।

दूसरे दिन हम फिर वहां गए। हालांकि हमें वहां जाना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि वहां से हमें हमेशा खाली हाथ लौटना पड़ता था।

इस बार हम सोच रहे थे कि शायद कोई कुछ बताए। उन्होंने हमें बताया कि हमें रेस्त्रां के मालिकों में से एक से बात करनी होगी। उनका नाम याकूब सर है। वह 64 साल के हैं। हमने उनसे रेस्त्रां के बारे में पूछा। उन्होंने बताया- हम चार पार्टनर हैं। मैं, मोहम्मद कासिम, सैय्यद नासिर और हामिद। हमने उनसे पूछा कि क्या आप सभी एक दूसरे को जानते थे? उन्होंने कहा- हां, हम एक दूसरे को जानते भले थे लेकिन हम रिश्तेदार नहीं हैं। रेस्त्रां शुरू करने के समय मेरे कुछ पार्टनर यहां रहने आए थे लेकिन मैं तो यहां चार सालों से रह रहा हूं। मैं बेरोजगार था और जब वे यहां आए तो वे भी खाली थे। फिर हमने सोचा कि हम सब मिलकर एक रेस्त्रां शुरू करें। यह अफगानी लोगों के लिए जरूरी था जो इलाज के लिए यहां आते हैं। यहां 2-3 अफगानी रेस्त्रां हैं लेकिन वे अच्छा खाना नहीं परोसते। यही वजह थी कि हमने यहां रेस्त्रां शुरू करने का फैसला किया।

मैंने उनसे पूछा कि अफगानिस्तान में वह क्या काम करते थे। उन्होंने बताया, वहां मेरी फोटोग्राफी, फोटोकॉपी और सरकारी महकमे को एप्लीकेशन लिखाने वाली एक दुकान थी। हम कैदियों की फोटो भी खींचा करते थे। दूसरे लोग भी अपनी फोटो खिंचवाने हमारे पास आते थे। आदमी भी आते थे, औरतें भी। वहां 4 साल दुकान चलाने के बाद याकूब सर भारत आ गए। उनके रेस्त्रां का नाम- द ग्रीन लीफ- दूसरे रेस्त्रां से अलग है इसलिए मैंने उनसे इसकी वजह पूछी। मैंने पूछा कि क्या आप लोगों ने बातचीत करके यह नाम तय किया है।

उन्होने कहा, नहीं। मेरे पार्टनरों और मैंने सोचा कि हमारे रेस्त्रां का नाम ऐसा हो ताकि हम लोगों को यहां आने के लिए आकर्षित कर सकें। हम चाहते थे कि वह नाम दिलचस्प हो। लंबी बातचीत के बाद हमने यह नाम पक्का किया- ग्रीन लीफ। इन लोगों ने 18 लाख रुपए से इस रेस्त्रां की शुरुआत की। सभी ने इसमें पैसा लगाया। रेस्त्रां शुरू करने में कोई परेशानी भी नही आई। किसी महिला ने उनकी मदद नहीं की। मैंने पूछा कि क्या उनमें से कोई इस बात के लिए परेशान थी कि आप लोग रेस्त्रां खोल रहे हैं। मैं यह जानना चाहती थी कि क्या उनके पड़ोसी ग्रीन लीफ से अपने रेस्त्रां की तुलना कर रहे थे। उन्होंने कहा- नहीं। उन्होंने हमें परेशान नहीं किया। लेकिन तुलना करना तो लाजमी था क्योंकि यह बिजनेस की बात थी। लेकिन सभी की अपनी-अपनी किस्मत होती है। हम भी एक दूसरे से लड़ना नहीं चाहते थे क्योंकि हमें नहीं पता था कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। जब मैं दूसरे रेस्त्रां, जैसे आर्या रेस्त्रां, अफगान रेस्त्रां और काबुल दुबई रेस्त्रां में गई, तो मैंने देखा कि उन्हें किसी से कोई समस्या नहीं है लेकिन हां, प्रतिस्पर्धा तो है ही। मैंने उनसे उनके शेफ्स के बारे में पूछा और यह जानना चाहा कि वे रेस्त्रां का सामान कहां से लाते हैं। एक रेस्त्रां वाले ने बताया, हमारे पास दो शेफ्स हैं- एक कबाब बनाता है, दूसरा बाकी के व्यंजन। वे खाना पकाने का सामान एक जगह से लाते हैं जैसे सब्जियां, सब्जी मार्केट से लाते हैं। लेकिन तभी तक जब तक सब्जी बेचने वाला उन्हें अच्छी सब्जी देता है। एक बार सब्जी वाले ने उन्हें खराब सब्जियां दे दीं। इसके बाद उन्होंने तुरंत दुकान बदल दी। वे खाना पकाने का सामान, कोल्ड और सॉफ्ट ड्रिंक्स लेकर आते हैं। उन्होंने कुछ लड़कों को नौकर या वेटर के तौर पर काम पर रखा है लेकिन वे उन्हें यूनिफॉर्म नहीं देते।

इसके बाद हम अपने सवालों के मुख्य बिंदुओं और पत्रिका पर आ गए। मैंने उनसे पूछा कि उनके रेस्त्रां में कितने ग्राहक आते हैं। उनमें आदमी और औरतें कितनी होती हैं। उन्होंने कहा कि दोनों बराबर की संख्या में हमारे यहां आते हैं। ग्राहकों में ज्यादातर अफगानी हैं। कुछ विदेशी और भारतीय ग्राहक भी हैं। भारत में अपना इलाज कराने आए बहुत से अफगानी उनके रेस्त्रां में आते हैं। चूंकि उनका रेस्त्रां मैक्स अस्पताल के सामने है, बहुत सी अफगानी औरतें अपने शौहर और परिवार के साथ आती हैं। 18 से 28 साल के बीच की बहुत कम औरतें यहां अकेली या अपने दोस्तों के साथ आती हैं। विदेशी ग्राहक अपने परिवार, दोस्तों या भारतीयों के साथ यहां आते हैं। अफगानी मरीज दिल्ली की अलग-अलग जगहों से यहां आते हैं।

मैंने उनसे पूछा कि क्या औरतों के रेस्त्रां में आने पर उन्हें कोई दिक्कत है। उन्होंने कहा- नहीं। रेस्त्रां के मालिक के तौर पर महिला ग्राहकों से उन्हें कोई समस्या नहीं है। हमारा काम अपने ग्राहकों को अच्छा खाना देना और उनकी मेजबानी करना है। इसलिए हमें इस बात से कोई दिक्कत नही है कि यहां कौन, किसके साथ आता है, हम उन्हें जज नहीं करते। अपने स्थायी ग्राहकों को वे डिस्काउंट भी देते हैं। उनका कोई ऑनलाइन एप नहीं है और वे आस-पास की जगहों से ही ऑर्डर लेते हैं। ज्यादातर लोग दोपहर 2 बजे से रात 9 बजे तक आते हैं। हां, रमजान के दौरान अधिकतर लोग इफ्तार के लिए आते हैं। इसके बाद हमने अपनी बातचीत खत्म कर दी।


Green Leave Restaurant

Nargis|

The owner of one of the restaurant that Tabassum, Vidhi and I visited asked us a few questions. They did not answer any of the questions that we asked them. So, we came back. We tried many times. I thought that because we are girls, they are not answering our questions. One day when we went to the restaurant, there was someone else. He said that “Why should we answer your question? We don’t know you and where you came from”.

Another day, we went there once again. Actually, it was not pleasant to go there because by then, we had come back many times from there, with no response.

This time we were wishing that someone would say something. They told us that we have to talk to one of the owners of the shop, Yaqoob Sir. He is 64 years old. We asked him a few questions related to his shop. He said that “We are 4 partners- Me, Mohammad Qasim, Sayeed Nasir and Hamid. I asked him whether each of them who opened the shop here, knew each other. He said, “Yes we know each other but we are not relatives. That time, some of my partners had recently come here but I have been living here since 4 years. I was unemployed and they had also just come, so, they were unemployed too. After some time, we decided to open a restaurant. Also, it is a need of the Afghan people, who come here for their treatment. There were only 2 to 3 Afghan restaurants and they were not having good dishes. That is a reason as to why we opened the restaurant here”.

I asked him what he did for a living when he was in Afghanistan. He said that, “I used to run a shop of photography, photocopy and application writing for the Government. We used to even take photos of the prisoners. Normal people also used to come to take photos. The number of men and women were equal”. He ran that shop for 4 years and then he came to India. The name of the restaurant was different from the other shop. So, I asked him why he had named his restaurant, the green leave. I asked if it was because of some discussion where someone said that this should be the name of the restaurant.

He told me, “No. My partners and I were thinking what should be the name of restaurant to attract people to come here or how to ensure that it looks interesting! After a long discussion, we decided to put the name of restaurant- Green Leave”. They have opened the restaurant with 18 lakhs. Each one of them contributed money. They did not face any kind of problems while opening the restaurant. Not a single woman figure helped them. I asked if they were bothered by the neighbouring restaurants when they opened their restaurant. I wanted to know if the neighbours compared their restaurants with the Green Leave. He said, “No. They don’t bother us, but they compared because business is all about comparison. But, all of us have our own luck with them. Even we do not want to fight with each other but I don’t know what is going on in their minds. As I visit other restaurants like the Arya restaurant, Afghan restaurant and Kabul Dubai restaurant, they don’t have any problem between them but logically, there is a competition”. In that way, I asked him about his chiefs and from where they bring the items for their restaurant. He said, “Basically we have two chiefs- the one who cooks kebabs and the other, who cooks other dishes. They bring their cooking stuffs from one place, like vegetables from vegetable market but only till the time, the seller does not give them spoiled vegetables. Once a seller gives them wrecked vegetables, then they change their shop immediately. In this way, they bring their cooking stuffs, cold drinks and soft drinks. They also have some boys as servants or waiters but they don’t have any formal uniforms.

Now, we come to the main point of my questions and our magazine. I asked him about his customers and the number of men and women. He said that both are equal. Most of their customers are Afghani. They also have foreigner and Indian customers. Most of the Afghan people, who come to India for treatment, come here. Since their shop is front of the Max hospital, many Afghan women come with their husbands or families and very few come alone or with friends between the ages of 18 to 28. Foreigners come alone, with family, friends as well as Indians. Afghan patients also come from different parts of Delhi.

I asked him if he has a problem with women coming to his restaurant. He said, “No. We don’t have any problem with women as we are the owners of the shop. Our work is to provide good food for our customers and hosting them. So, it doesn’t matter to us who comes with whom and we do not judge them”. They also give discounts to their permanent customers. They do not have any online app but they take orders only from their neighbourhood places. Most of the people come between 2pm to 9pm but during Ramadan, most people come at Iftar. On that note, we ended our conversation.

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