रेस्त्रां का दौरा और मजेदार किस्से

गुफरान और नितिन |

हमने यह सोचा है कि क्यों न यह पता लगाया जाए कि हमारे इलाके में कितने फूड एप्स का इस्तेमाल किया जाता है। बड़े बड़े रेस्त्रां और होटलों मे तो इसका इस्तेमाल होता ही है। जैसे डॉमिनोज को ही लीजिए। वहां आप कॉल करके भी आर्डर कर सकते हैं और ऑनलाइन ऑर्डर भी किया जा सकता है। हमें यह पता लगाना था कि क्या हमारे इलाके में भी ऑनलाइन ऑर्डर का इस्तेमाल होता है।

पहला दिन

आज हमारा पहला दिन है। हमने सोचा कि हम पहले खिड़की की गलियों की तरफ जाते हैं। पहले हम नितिन के घर गए। फिर हम दोनों मिलकर खिड़की की गलियों में चल पड़े। रास्ते में नितिन और मैं सोचते रहे, पहले कहां जाएं। कौन से ढाबे पर जाएं। अभी हम आपस में बात कर ही रहे थे कि हमारी नजर निधि फास्ट फूड पर पड़ी। हमने सोचा, क्यों हम शुरुआत यहीं से करें। हम उस ढाबे पर चले गए। वहां काउंटर पर एक लड़की बैठी थी। हमने उससे पूछा, इस ढाबे का मालिक कौन है? लड़की ने बताया कि उसके पापा ही इस ढाबे के मालिक हैं। उसने अपने पापा को बुलाया। पहले तो हमें समझ नहीं आया कि हम उनसे बात की शुरुआत कैसे करें। उनसे क्या पूछें। फिर हिम्मत जुटाकर हमने उनसे ढाबे के नाम के बारे मे पूछा। उन्होंने बताया कि इस ढाबे का नाम उन्होंने अपनी बेटी के नाम पर रखा है। यह ढाबा भी ज्यादा पुराना नहीं है। 4-5 महीने पहले ही शुरू हुआ है। हमने उनसे पूछा कि क्या वे डिलिवरी भी करते हैं? उन्होंने कहा कि वे लोग डिलिवरी भी करते हैं लेकिन ऑनलाइन ऑर्डर नहीं लेते। हमने पूछा कि उन्हें डिलिवरी करने में क्या-क्या दिक्कतें आती हैं? उन्होंने बताया कि ज्यादा दिक्कत तो नहीं आती लेकिन कभी-कभी ट्रैफिक की वजह से डिलिवरी पहुंचने में वक्त लग जाता है।

दूसरा दिन

आज हमारा दूसरा दिन है। आज भी हम खिड़की के ढाबों के चक्कर लगाएंगे। नितिन और मैं मिले और सोचने लगे कि कहां जाएं। लेकिन कल की तरह हमारे मन में कोई उलझन नहीं थी। हम समझ चुके हैं कि हमें क्या पूछना है और कैसे बात करनी है। हमने सोचा कि आज हम चौहान फूड में जा सकते हैं। उस ढाबे का लुक बाहर से बहुत अच्छा है। किसी रेस्त्रां की तरह। हम दोनों उस रेस्त्रां के अंदर गए। हमने देखा कि वहां काउंटर पर कंप्यूटर रखा है। तभी हमें समझ में आ गया कि यहां पक्का ऑनलाइन ऑर्डर लिया जाता है। हमने इधर-उधर नजर दौड़ाई। रेस्त्रां बाहर से जितना खूबसूरत है, अंदर से भी उतना ही शानदार है। हम रेस्त्रां के मालिक के पास गए। वह हमें देखते ही पहचान गया। हमने सोचा, लीजिए, इसे भी हमारा चेहरा याद है। हमने कुछ देर उससे बात की और बातों-ही-बातों में पूछ लिया कि वह किस किस तरह से ऑर्डर लेते हैं। उन्होंने कहा कि हम फोन पर तो ऑर्डर लेते ही हैं, ऑनलाइन ऑर्डर भी लेते हैं। यह विकल्प रेस्त्रां शुरुआत से ही अपने ग्राहकों को देता है। मतलब शुरू से ही वे लोग दोनों तरह से ऑर्डर लेते हैं। डिलिवरी के लिए उनके पास बाइक भी है। ऑर्डर दूर का हो या पास का, उनके डिलिवरी ब्वॉय बाइक पर ही जाते हैं। रेस्त्रां के मालिक ने बताया कि उनकी कोशिश होती है कि डिलिवरी समय पर हो लेकिन कभी-कभार ट्रैफिक के चलते थोड़ी देर हो जाती है।

इसके बाद हम कई दूसरे ढाबों पर भी गए। इस पूरी कवायद का नतीजा यह निकलकर आया कि ऐसे बहुत कम रेस्त्रां हैं जो ऑनलाइन ऑर्डर की सुविधा देते हैं। ऐसे ढाबे भी हैं, जहां से आप खाना ऑर्डर नहीं कर सकते। मतलब, वे डिलिवरी करते ही नहीं।

तीसरा दिन

आज हमने हौज रानी जाने का फैसला किया था। रोज की तरह आज भी नितिन और मैं मिलकर यह सोचने लगे कि हौजरानी के किस रेस्त्रां का दौरा किया जाए। मुझे ख्याल आया कि वहां दो ऐसे रेस्त्रां हैं जो खूब चलते हैं। इनमें से एक है हाफिज जी होटल और दूसरा है हाजी यूनुस होटल। काफी सोच-विचार करने के बाद हमने तय किया कि हम हाजी यूनुस होटल चलते हैं। वह पास भी है और पुराना भी। यह करीब 12-15 साल पुराना है। पहले यहां यूनुस अंकल खुद बैठते थे। अब उनका बेटा बैठता है लेकिन वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता। तो, हम रेस्त्रां पहुंच गए। हमने यूनुस अंकल के बेटे से बातचीत करने की कोशिश की तो उसने सवाल दागा- तुम लोग यह सब जानकर क्या करोगे? हमने सकुचाते हुए कहा, यह हमारे स्कूल का प्रॉजेक्ट है। हमें इसे पूरा करना है। तब कहीं जाकर वह बात करने को राजी हुआ। हमने उससे पूछा- क्या आप होम डिलिवरी करते हैं? उसने इनकार करते हुए सिर हिलाया। फिर बोला, जिसे खाना होता है, यहां आकर खाता है या पैक करा के ले जाता है। हम वहां से निकल गए। फिर हाफिज जी होटल में गए। होटल के मालिक से तो मुलाकात नहीं हुई लेकिन वहां काम करने वालो से बातचीत हो गई। वहां भी होम डिलिवरी की सुविधा नहीं थी। हमने सोचा कि जब डिलिवरी की सुविधा नहीं है तो ऑनलाइन ऑर्डर का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

अभी हम वहां घूम ही रहे थे कि हमारी नजर एक रेस्त्रां पर पड़ी। इस रेस्त्रां को यहां नेपाली के होटल के नाम से जानते हैं क्योंकि इसका मालिक और यहां काम करने वाले सभी नेपाली हैं। यहां वेज और नॉन वेज, दोनों तरह का खाना मिलता है। जब हमने इस रेस्त्रां में जाकर बात की तो हमें पता चला कि वह होम डिलिवरी तो करते हैं लेकिन ऑनलाइन डिलिवरी नहीं करते। हमने उनसे पूछा कि उनके ऑर्डर कहां के होते हैं- दूर के या पास के। उन्होंने बताया कि ऑर्डर ज्यादा दूर के नहीं, पास के होते हैं जैसे मालवीय नगर, गुप्ता कालोनी और खिड़की तक के। हमने उनसे उनके ग्राहकों के बारे में पूछा। हमें पता चला कि उनके यहां हर तरह के ग्राहक आते हैं। बंगाली, नेपाली, सभी। महिलाएं भी आती हैं पर वहां बैठकर खाने की बजाय खाना पैक कराती हैं। हमने उनके सबसे लोकप्रिय व्यंजनों के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उनके यहां की पनीर की सब्जी और दाल सबसे ज्यादा बिकती है।

चौथा दिन

आज मेरा चौथा दिन है और आज मैं अकेले हूं क्योंकि नितिन को आज कुछ काम था। आज मैंने सोचा कि बिरयानी की दुकानों पर चला जाए। नितिन के बिना आज थोड़ा अकेलापन महसूस हो रहा था लेकिन जाना तो था ही। मैं सबसे पहले मुरादाबाद बिरयानी वाले के पास गया। मुझे वहां की बिरयानी बहुत अच्छी लगती है। उसके पास तीन तरह की बिरयानी होती है- चिकन, मटन और वेज बिरयानी। उसके साथ वह दो तरह की चटनी देता है। एक मिर्च वाली लाल रंग की, दूसरी सफेद रंग की दही वाली। मुरादाबाद बिरयानी वाला भी होम डिलिवरी नहीं करता। उसके ज्यादातर ग्राहक सभी तरह के लोग होते हैं, हां, मुसलिम ज्यादा आते हैं। महिलाएं भी आती हैं लेकिन दूसरे ढाबों की तरह खाना पैक करा के ले जाती हैं। यहां भी पूछना फिजूल था कि आप ऑनलाइन डिलिवरी करते हैं क्या… भई, जब होम डिलिवरी ही नहीं करते, तो इस तरह का सवाल पूछना बेतुकी बात ही है।

पांचवा दिन

आज हमने कैफे में जाने का फैसला किया। नितिन का विचार था कि बलौर केफे में चला जाए। बलौर कैफे जिस जगह पर है, वहां पहले एक मोटर मैकेनिक की दुकान थी। 4-5 महीने पहले ही वह दुकान बंद हो गई और बलौर कैफे की शुरुआत हुई। दो लोगों ने पार्टनरशिप में यह कैफे खोला है। इसमें से एक नितिन का जानने वाला है। इसलिए हमें ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ी। हमें पता था कि वहां किसी से बात करने में हमें परेशानी नहीं होगी। पहले इस कैफे को कोई नहीं जानता था। फिर नितिन ने अपने कई दोस्तों को इसके बारे में बताया। अगर आपको कोई पार्टी करनी है, जैसे बर्थडे पार्टी, तो आप यहां आ सकते हैं। नितिन के जानने वालों को कैफे वाला डिस्काउंट भी देता है। इस तरह नितिन ने इस कैफे के लिए काफी प्रचार किया। मुझे लगता था कि यहां खाने-पीने की तरह-तरह की चीजें मिलेंगी लेकिन लोग तो यहां हुक्का पीने आते हैं। यहां अलग-अलग फ्लेवर के, अलग-अलग डिजाइन के हुक्के मिलते हैं। हुक्के को कॉम्बो भी हैं यहां। जैसे किसी के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री है तो किसी के साथ नूडल्स। यहां से निकलकर हम एक दूसरी दुकान में गए। इसका नाम फुची है। यहां चिकन, फिश सूप, मोमोज़ और चाऊमीन मिलती है। हमने यहां भी कुछ बातचीत की। हमने पूछा कि आप किस तरह ऑर्डर लेते हैं। किस तरह के ग्राहक आते हैं यहां। इसके मालिक ने बताया कि हम फोन और ऑनलाइन, दोनों तरह के ऑर्डर लेते हैं। हमने पूछा कि ऑनलाइन ऑर्डर किस एप पर लेते हैं। तो हमें पता चला कि फुची फूड पांडा और हांडी एप, दोनों के जरिए ऑनलाइन ऑर्डर लेता है। इसके अलावा आस-पास के लोग यहां आकर भी खाना खाते हैं।

यूसेज

इन कोशिशों से हमें एक बात साफ पता चली। खिड़की में कुछ दुकानें ऑनलाइन ऑर्डर लेती हैं पर हौज रानी में नहीं। हमें यह भी पता चला कि फैमिलीज तो ऑर्डर करती ही हैं, पर बहुत सारे टीनएजर्स ऑनलाइन ऑर्डर करना पसंद करते हैं। कुछ जगहों पर महिलाएं भी ऑनलाइन ऑर्डर करती हैं।


Researching the Order

Gufran and Nitin |

We decided to find out how many food apps are being used in our locality. Large restaurants and big hotels like the Dominoz use it frequently. One can order on line or calling them up on mobile.  We needed to find out whether it is being done in our locality also.

Day 1
Today was the first day of the survey. I thought of visiting the lanes and by lanes of Khirki. I went to Nitin’s house first and then together we walked through the lanes, thinking where to go first. And then as our eyes fell on Nidhi Fast food, we decided to step inside. We asked the girl at the counter who the owner was. She informed us that it was her father who owned it. When her father came towards us, looking inquisitively at us, we found ourselves a bit confused; how to start the conversation? And then we asked him why he had named his restaurant ‘Nidhi Fast Food’. He told us that he had named it after his daughter. Nidhi Fast food, the food joint was only five months old.  We asked him whether they have home delivery system. He told us they do have home delivery system but then it was not on line. Our next question was whether they face any problem in home delivery. He said not much problem is being faced except that the delivery sometimes gets delayed due to heavy traffic on the road.

Day 2
Today is our second day of surveying. We decided to go around the ‘dhabas’ , the food joints in Khirki itself. I and Nitin were again thinking where to go to first. But like day one, we were not confused at all. We knew what to ask and how to ask. We quickly decided to go to Chauhan Food Joint. This dhaba looks very nice from outside. It looks like any other good quality restaurant. As we went inside and noticed the computer kept at the counter, we knew they take order on line. We looked around and realised that the restaurant looked magnificent inside too. We met the restaurant owner and started our conversation and managed to ask him how the orders are placed. He informed us that they take order on phone and on line too. They have both the facilities for their clients from the very beginning. For home delivery, they have motor bikes too. Even when the destination is closer, the delivery boys go by the motor bikes only. It is their effort to reach the destination on time. But there are times, when the delivery gets delayed due to heavy traffic on roads.
After this, we went to several other food joints. We found out that there are few restaurants that have on line facility. Even there are restaurants that do not have home delivery system at all.

Day 3
Today we decided to go to Hauzrani. As usual, me and Nitin started discussing as to which restaurants to go to. I remembered then that there are two restaurants in Hauzrani that are very popular. One of them is Hafiz ji Hotel and the other is the Haji Yunus hotel. After much discussion, we decided to go to Haji Yunus hotel. It was closer and also much older. It was almost 12 to 15 years old. Initially, uncle Yunus used to sit on the counter himself. Now, his son runs it but he does not talk much. When we entered the hotel and started asking him questions, he asked us why we wanted to know all that. When we told him with hesitation that actually this was a part of our school project that we have to complete it, he agreed to answer. As usual, we asked him whether they have a home delivery system. He immediately nodded ‘no’. He said those who want to eat, they come here and eat. Otherwise they themselves take the food home. We left the hotel and then we went to Hafij ji Hotel. We could not meet the owner of the hotel but could talk to the employees. We came to know that they also do not have home delivery system. As we took a walk around Hauzrani, we noticed a restaurant which is known as Nepali hotel. This was because the owners as well as the employees in that hotel were all Nepalise. They serve vegetarian as well as non vegetarian food. They do have home delivery system but it is not done on line. We asked them whether they take orders from far off places; they said they don’t, that they take orders from nearby places like Maviya Nagar, Gupta colony, and Khirki.  When we asked them about their clients, we came to know that they have clients from all communities: Bengalis, Nepalis. They have women clients also but they generally take the food home. We asked them about their most popular dish, they told us that paneer and daal sell the most.

Day 4
Today is the fourth day of the survey. I have to do it all by myself since Nitin had to go somewhere on work. I thought of visiting the Biriyani food joints. I was feeling a bit lonely without the company of Nitin but then, I had to complete the survey. First, I went to Muradabad Biriyani food joint. I really love their biriyani. They have three types of biriyani: Chicken, mutton and Veg biriyani. They serve two types of chutnis: one is red, made from chillis, the other is white, made from curd. Muradabad Biryani dhaba also does not have home delivery system. They have clients from all communities and Muslims come in great numbers. They have female clients but they take food home. I could not ask about on line delivery. When there is no home delivery, this kind of question is foolishness.

Day 5
Today, we decided to visit Cafes. Nitin wanted to go to Vellor café. Five months back, there was a motor repair shop in that place. When it closed down, Vellor Café was set up there. Two persons had set up the café in partnership and one of them knew Nitin personally. That is why we did not face any problem there. In the beginning, nobody knew about the café. It was Nitin who told many of his friends about it. If you want to celebrate birthday, you can celebrate it here. The café owner even gives discount if the person is known to Nitin. Nitin had told many people about the café. I had thought that there would be many eatables in this café but came to know that people generally visit this café in order to smoke. Different types of smokes are available here there are different schemes too. With some, cold drink is given free and with some, noodles is offered free of cost.  After coming out of the café, we went to another café called Fuchi. There, chicken, fish, soup, and momos are being served. When we asked them how do they take orders, they told us that they take order on phone as well as on line. We wanted to know which app they use to take order on line. We came to know that they take orders on apps like Food panda and Handi. Apart from that, people who live closeby, come there and eat.
We learnt a lot about the food joints. One thing became clear that some eateries in Khirki take order on line but Hauzrani does not have the facility. We also learnt that apart from families, it is the teenager who likes to order on line. In some places, women use this facility a lot.

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