बंकर 

ज़ाहरा |

एक दिन हम गहरी नींद में सो रहे थे कि अचानक जोरदार धमाका हुआ। हम जाग गए।
हमें पता चला कि दूसरे मैक्रोरायन क्षेत्र में तनाव भड़क गया है। यह क्षेत्र काबुल सागर और पहले मैक्रोरायन क्षेत्र की दूसरी तरफ था। हम पहले मैक्रोरायन क्षेत्र में रहते थे। धमाका इतना तेज था कि हम भयभीत होकर ब्लॉक के तहखाने में छिप गए।
धमाके की तेज आवाज से डरकर पड़ोस का चार साल का बच्चा जोर-जोर से रो रहा था। उसकी मां ने उसे सीने में छिपाया हुआ था और उसे चुप करा रही थी। वह कह रही थी कि मां के रहते उसे डरने की कोई जरूरत नहीं है। गोलियों की आवाजों से बड़े-बड़ों के पसीने छूट रहे थे।
बाहर से तरह-तरह की आवाजें आ रही थीं। हम घबराए हुए थे। लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे। बेबस होकर हमने अपने माता-पिता से कसकर चिपके हुए थे।
दिन भर तहखाने में बंद रहना भी बहुत खौफनाक था। हम थके हुए और भूखे थे। हर कोई बाहर जाना चाहता था। रात को गोलीबारी बंद हुई, माहौल कुछ शांत हुआ। बड़े लोग तहखाने से बाहर निकलकर अपने-अपने घर पहुंचे और खाने का इंतजाम करने लगे। उन्हें सावधानीपूर्वक वापस तहखाने में जल्द लौटना भी था।
अगले दिन भी वही हुआ। बड़ों ने घर वापस जाकर खाने का इंतजाम करने का फैसला किया। तहखाने में खाने का कोई स्टॉक नहीं था। हमारे पड़ोस की एक औरत ने बताया कि युद्ध अभी जारी है और इस सुरक्षित जगह को छोड़कर जाना अक्लमंदी नहीं होगी। लेकिन कुछ लोगों को तो जाना ही था। मेरे पिता और दो और आदमियों ने बाहर जाने का फैसला किया। जब एक घंटे के बाद भी वे लोग वापस नहीं आए तो हमें चिंता होने लगी। काफी लंबे समय बाद वे लोग लौटे। एक आदमी के माथे पर चोट लगी हुई थी। मेरे पिता ने पैरों में कपड़ा बांधा हुआ था। उनके पैर में चोट लगी थी और खून बह रहा था। हां, वे लोग हमारे लिए कुछ खाने को ले आए थे। हम भय और अनिश्चितता के बीच एक हफ्ते तक तहखाने में बंद रहे।
एक हफ्ते बाद हम बाहर आए पर लड़ाई थमी नहीं थी। जिस दिन हम वापस आए, हमारे घर की खिड़की के पास एक रॉकेट एकाएक गिरा और मेरा भाई घायल हो गया। हमें लगा कि हमने उसे खो दिया। मेरे दूसरे भाई ने उसकी नब्ज देखी। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। हमें थोड़ी तसल्ली हुई। फिर मेरे दो भाई मिलकर उसे अस्पताल ले गए। हमें इस लड़ाई और उसके असर को अपने जेहन से निकालना था। एक हफ्ते बाद जब युद्ध समाप्त हो गया, हम सुरक्षित स्थान की ओर चल दिए।
वह सुरक्षित स्थान ईरान था। हम वहां अपने रिश्तेदार के घर पर रहे। युद्ध के घाव, कड़वे अनुभव अब भी हमारे साथ थे। हम घर से बाहर नहीं निकल पाते थे। ऐसा लगता था कि घर के बाहर गोलीबारी, बमबारी हो रही है, शोरशराबा मचा हुआ है। हमें जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम अफगानिस्तान को पीछे छोड़ आए हैं। जिस जगह पर है, वहां लड़ाई नहीं, शांति है। तीसरे दिन हमारे रिश्तेदार ने जोर देकर कहा कि हमें बाहर जाना चाहिए। अपने जेहन के डर और चिंता से हमें निजात पाना चाहिए। यह जरूरी है। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद युद्ध की विभीषिका से बाहर आना मुश्किल था। अब हमें उसके साथ ही जिंदगी जीना सीखना था।
एक महीने बाद हमें पता चला कि युद्ध थम गया है। हम अफगानिस्तान लौट गए। युद्ध में सड़कें, इमारतें तहस-नहस हो चुकी थीं। हमारे घर ढह चुका था। शीशे टूटे हुए थे। धूल फैली थी। फर्नीचर बिखरा पड़ा था। हम वहां कैसे रह सकते थे। हमें नई जगह खोजनी थी। युद्ध फिर छिड़ गया। कभी जोरदार तरीके से औऱ कभी दबे-छिपे। हमें घर छोड़ना ही पड़ा। हम भारत पहुंच गए- हमें उम्मीद थी कि मौत और खूनखराबे की तस्वीरें अब हमारा पीछा छोड़ देंगी। क्या ऐसे अनुभवों को भुलाना आसान होता है?
अब हम खिड़की एक्सटेंशन में रहते हैं। हमारी जिंदगी बदल गई है। फिर भी युद्ध का खौफ अब भी हमारे भीतर कहीं दबा हुआ है। किसी फिल्म का कोई रक्त रंजित दृश्य या पड़ोस में होने वाली लड़ाई हमें उन भयंकर दिनों की याद दिला दिया करते हैं।


Bunker

Zara |

One day while we were in a deep sleep, a loud explosion woke us up.
We got to know that tension brewed amongst the second Macroryan region, located on the other side of the Kabul Sea and the first Macroryan region, where we were. The explosions were massive which forced us to escape to the underground of the block.
A four years old kid from the neighbourhood, started wailing due to the sound of explosions. The boy’s mother hugged him and told him not to worry. She assured him that she would protect him from getting hurt. The sound of bullets equally frightened the elders.
The myriad sounds that came from the outside worried us. We could hear people shouting for help. Out of sheer helplessness, we clung to our parents.
Through the day, locked in the cellar, tired and hungry, everybody was desperate to go back to the normal life. The night the bombardment diminished, and the environment outside felt peaceful, the elders took the opportunity to return home and prepare food. However, soon they had to plan their return to the underground carefully.
On the second day, the elders wanted to go home and bring back some more food. There was nothing stocked up underground. A woman from our neighbourhood informed us that the war was still on and it wouldn’t be wise to leave this safe zone lest somebody gets hurt. However, someone had to go. My dad and two other men decided to help out. When an hour passed and none of them returned, we panicked. After a long wait, my dad and the two men returned. One of the men had a small bruise on his feet. My dad got hold of a piece of cloth and tightly wrapped it around his feet to stop the blood flow. Of course, they managed to get some food for all of us. We spent about a week underground, in constant fear and uncertainty.

The day we returned, suddenly a rocket hit the ground near the window of our house, and my brother got injured. We thought that he would not be able to make it. My other brother checked his pulses and saw that his heart was beating faster than usual. We were a little relieved, and with the help of my third brother, we transferred him to the hospital. We had to forget the ongoing war and its repercussions at that moment. A week later, when the war ended, we migrated to a safe place.
That safe place was Iran. We went to live at a relative’s house. The trauma of the war hadn’t left us. We couldn’t leave the house and imagined that there were gunshots, bombardments and yelling outside the home. We couldn’t bring ourselves to believe that we left it behind and returned to a place where there was no war. On the third day, our relative insisted that we must go outside. It was essential to break away from the fear and anxiety that marred our thoughts. We tried, but the trauma was never really gone. We learnt to live with it.
After a month when we heard that the war is over, we went back to Afghanistan. The war destroyed many roads and buildings. On reaching home, we found that everything had almost collapsed. Broken mirrors, dust and furniture lay scattered. We could no longer live there and thus moved to a new place. However, the war continued, sometimes vigorously and at times surreptitiously. We had to leave home. We relocated to India in the hope that constant images of death and bloodbath wouldn’t haunt us. Is it possible to erase lived experiences?
Now when we are in Khirki Extension, our lives have taken on a new form. The fear of war may remain hidden, but little things like a gory scene from a cinema or a fight in the neighbourhood trigger some of those horrific moments that we witnessed.

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