नदी

गुफरान |

मुझे नदी में नहाने से डर लगता है। यह मेरा ऐसा डर है जो वापस लौट-लौटकर मेरे पास आता है। मैं चाहकर भी अपने इस डर को खत्म नहीं कर पाता क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता और साथ ही बहुत कम ऐसे मौके आते हैं कि मैं नदी में नहा सकूं। मैं भी चाहता हूं कि मैं अपने दोस्तों के साथ पानी में मज़े करूं। एक किनारे से दूसरे किनारे तक तैरूं , कलाबाजियां करूं पर हकीकत तो यह है कि मैं यह सब नहीं कर सकता। मुझे नदी में नहाने का मौका तब ही मिलता है जब मैं गांव जाता हूं। वह भी एक साल में एक ही बार जाता हूं। मैं जब भी नदी में नहाता हूं तब मुझे बहुत घबराहट होने लगती है। ऐसा महसूस होता है, जैसे पानी मुझे अंदर की तरफ खिंच रहा हो। शरीर सुन्न सा होने लगता है और अगर मैं पानी में थोड़ा ज्यादा अंदर चला जाऊं, मानो पानी का लेवल मेरे सीने तक हो तो मेरी सांसे तेज हो जाती हैं। मेरा दम घुटने लगता है। यह सब चीज़े मुझे पहले नहीं होती थीं। जब मैं शायद 12 या 13 साल का था। उस बार मैं गांव अकेला गया था। यह पहली बार था जब मैंने इतना लंबा सफर तय किया था। गांव पहुंचने के बाद अपने मन से घूमना-फिरना, अपने मन से खाना और मज़े करना। तभी मेरी चाची अपनी मम्मी के घर जा रही थीं तो मैंने सोचा, ऐसे भी मैं घूमने ही आया हूं तो क्यों ना चाची के साथ उनके घर चला जाऊं। मैंने भी साथ जाने को कहा। पहले तो दादा ने मना कर दिया। फिर चाचा ने मनाया तो दादा मान गए। जब हम उनके यहां गए तो पहले सभी रिश्तेदारों से मिले- थोड़ा घूमे-फिर। दूसरे दिन मामा के बेटे ने मुझे नदी के बारे में बताया जो घर के पास ही थी। तो मैंने सोचा, ऐसे भी कम मौके मिलते हैं नदी में नहाने के और इस बार मम्मी-पापा भी नहीं हैं तो क्यों न मौके का फायदा उठाया जाए। तो मैंने अपने चाचा को बोला कि मुझे नदी में नहाने जाना है। उन्होंने मना कर दिया। मैंने घर में सबसे बोला तो सबने मना कर दिया। फिर आखिर में जाकर नानी मान गईं पर उन्होंने कहा, अभी धूप बहुत है। पानी गर्म होगा तो थोड़ी देर बाद चलेंगे। यह बोलकर वह सोने चली गईं। दोपहर का वक़्त था। घर में सब खाना खाकर आराम कर रहे थे। पर मुझे बेचैनी हो रही थी जल्दी जाने की, इसीलिए मुझे नींद भी नहीं आ रही थी। मैं सोच रहा था कि अब क्या करूं और बार-बार टाइम देख रहा था तभी मैंने सोचा मैं चुपचाप चला जाता हूं। नानी थोड़ी देर में आ ही जाएंगी। मैंने अपने मामा के बेटे को उठाया और साथ जाने को कहा। वह नहीं माना, तो मैंने बोला, ठीक है तू सो। मैं जा रहा हूं। वह कहने लगा, अकेले मत जाओ। मैं भी चल रहा हूं। पर मेरी एक शर्त है। मुझे कुछ खिलाना पड़ेगा तो मैंने कहास ठीक है तू चल तो सही। हम हमारे कमरे से बाहर निकले तो चाचा बाहर सो रहे थे। पहले मैं चुपचाप जाने लगा, पर चाचा की नींद टूटी गई। उन्होंने मुझे देख लिया और पूछने लगे कि कहां जा रहा है। मैं सोचने लगा कि अब क्या बोलूं तो मैंने बाथरूम जाने का बहाना बनाया और आंगन में आ गया। जब चाचा सो गए तो वह भी बाहर आ गया। हम फिर आराम से घर के बाहर आ गए। पहले तो हम आइसक्रीम खाने गए, उसके बाद नदी की तरफ। जब हम नदी की तरफ जा ही रहे थे तो मामा रास्ते में मिल गए। वह बगीचे से वापस आ रहे थे। बगीचा बिल्कुल नदी के पास ही है। उन्होंने हमें पकड़ लिया। मुझे ज्यादा कुछ नहीं बोला पर भाई को डांटा और वापस घर ले गए। मैं सोचने लगा कि अब तो हम गए। जो नहाने का प्लान था, सब कैंसिल और चाचा भी डांटेंगे। घर जाकर सबकी डांट सुनते, उससे पहले नानी ने हमें बचा लिया। वह कहने लगीं, चलो चलाते हैं। मैं तो खुश हो गया क्योंकि डांट से भी बच गए और नहाने को मिल रहा था। मुझे तो उस वक़्त भी तैरना नहीं आता था। फिर भी मैं उतने पानी में नहाता, जितने में चल सकूं और पानी का लेवल मेरे गले तक हो। उस नदी के बारे में मैं कुछ नहीं जानता था। तब भी मैं और मेरा भाई मज़े से नहा रहे थे। फिर मामा भी आ गए। मामा और उनके बेटे को तैरना आता था, तो वह दूर-दूर तक तैर रहे थे और मैं किनारे नहा रहा था। मैं पानी में थोड़ी सी आगे गया, मुझे नहीं पता था कि आगे ज्यादा गहरा है। मैं गया, फिर वापस घूम गया और घूमकर मैंने जैसे ही पहला कदम रखा, मेरा पैर फिसल गया और मैं पीछे की तरफ गिर गया और डूबने लगा। मैंने बहुत कोशिश की आगे बढ़ने की, पर नही बढ़ पाया। मुझे तो ऐसा लगा जैसे आज तो गया। आज मेरा आखिरी दिन है। तब मैं कोशिश करके कूदा ताकि मैं आवाज दे सकूं, पर मेरे मुंह से तो आवाज़ भी नहीं निकल रही थी। फिर जब मैंने तीसरा जंप मारा तो मुझे मामा ने देख लिया और जल्दी से पीछे से धक्का मारा और मैं आगे की तरफ आ गया और बच गया। उस वक़्त जमीन मुझसे सिर्फ दो कदम दूर थी और मैं अपने-आप को दो कदम भी नहीं बढ़ा सका। उस हादसे के बाद से ही मेरे मन में पानी का डर बैठ गया। आज मैं 17 साल का हूं- अभी भी मैं जब भी गांव जाता हूं, कम से कम एक बार तो नदी में नहाने जरूर जाता हूं ताकि मैं तैरना सीख सकूं और अपने डर को खत्म कर सकूं पर मैं नहीं कर पाता। मैं उतने ही पानी में नहाता हूं जब तक पानी का लेवल मेरे पेट तक या सीने तक हो। आज तक इस हादसे के बारे में मेरी फैमिली में किसी को नहीं पता।


River

Gufran |

I am afraid of bathing in rivers. This fear keeps returning over and over, to disturb me. I can’t overcome it, though I really try to – because I can’t swim, and because there are very few chances to actually bathe in a river and reduce the fear. I often think about having fun with my friends in the water, swimming from bank to bank, performing tricks and so on, but in reality I can’t do any of this.

I only get the chance to bathe in the river when I visit my village; and that too only once in the year. And each time I enter the water I become agitated, I feel the current is dragging me out towards the middle of the river. My body goes numb, and if I go a little deeper so that the water reaches my chest, I start breathing very fast. I begin to feel suffocated.

This never happened when I was small. It started when I was 12 or 13 years old. I travelled from the city to my village on my own. This was the first time I made such a long journey by myself. Once I was there I enjoyed myself, roaming around, eating whatever I wished whenever I wished. My aunt was going to visit her mother who lived elsewhere, and I thought, “Since I am on holiday, why don’t I go with her, I will be able to see more places.” I asked if I could accompany her. Initially my grandfather did not agree but my uncle convinced him to give me permission. After we reached there we spent time with all our relatives and did some sight-seeing. The next day my cousin told me about the river near the house. I thought, “This is a fine chance to bathe there, I should take it as my parents are not here to stop me.” I told my uncle what I wanted to do. He forbade it. So did everyone else in the house when I expressed my wish to them. Finally my grandmother agreed to accompany me, but then said, “The sun is really strong right now and the water will be very hot. We’ll go after a little while.”

It was afternoon. Everyone in the house was resting after lunch. I was so eager to go to the river as soon as possible, I was too restless to sleep. I didn’t know what to do. I kept looking at the time and then I thought, “I will quietly slip out now, and Grandmother will in any case follow soon.” I woke my cousin and asked him to come with me. He refused, so I said, “Okay, go back to sleep. I am going.” He said, “Don’t go by yourself. I’ll come with you on one condition, that you treat me to something.” I said, “That’s fine, now hurry up.” As we left our room we saw Uncle sleeping outside. I tried to tiptoe past but he woke up and asked where we were going. I didn’t know what to say so I made the excuse that I was going to the bathroom, and went into the courtyard. Uncle went back to sleep, and then my cousin also slipped past him. After that we walked out of the house without any problem.

First we went to eat some ice cream and then walked towards the river. On the way we met my other uncle, my cousin’s father. He was returning from the park. This park was very close to the river. He caught hold of us. He didn’t say much to me but really scolded my cousin and took us back to the house. I thought, “Now we have really had it. The bathing plan is cancelled and Uncle will keep scolding.” But before that our grandmother intervened, saying, “Let’s go!” I was happy because not only had we been saved from the scolding, but we were also going to be able to bathe in the river.

At that time I didn’t know how to swim. Even then, whenever I was in the river I would walk out till the water reached my neck. I didn’t know anything about that particular river, but I didn’t care – I was happily splashing around with my cousin. Then his father arrived. He and my cousin both could swim well, so they swam quite a long distance away from me while I remained near the bank. I moved forward cautiously, not knowing the depth of the river where I stood. I sensed it was deepening and turned around to go back, but my foot slipped; I fell backwards and began to drown. I tried as hard as I could to get myself towards the bank but I could not. I thought, this is it, today is my last day. Then with great effort I jumped, getting my head above water; I tried to shout but no sound came out of my mouth. Upon my third such jump my uncle saw me. He quickly swam back and saved me by giving me a huge shove from behind that flung me back towards the bank. I realized I had actually been only two steps away from firm ground, but I had not been able to take even two steps.

After this incident a fear of water took root in my mind. Today I am 17 years old. When I visit my village I go at least once to bathe in the river. I want to learn to swim and put an end to my fear but I just cannot do it. Now I only go into the water till it is at the level of my stomach. And even today my family has no idea that I once nearly drowned.

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