तंदूर को अब भी मिस करती हैं

लता जी |

दुर्गा और उसकी मां लता जी खिड़की की गलियों में पिछले दो दशकों से कपड़ों की इस्त्री का काम कर रही हैं। इससे पहले उनकी दुकान एक छोटे से कोने में थी। सड़क किनारे एस्बेस्टस की छत के नीचे। वह दुकान उस एकमंजिला मकान का एक्सटेंशन थी जिसके तंग कमरों में दूर-दराज के इलाकों से आने वाले मजदूर रहा करते थे। फिर वह मकान तोड़ दिया और उसकी जगह नए मकान ने ले ली। हां, मकान के मालिक ने दुर्गा और उसकी मां से वादा किया कि वह नए मकान के बाहर भी उन्हें अपनी दुकान लगाने देगा।

दुर्गा और उसकी मां दक्षिण पुरी से रोजाना सुबह यहां आती हैं। उनसे बात करते हुए पता चलता है कि वह इस्त्री और खाना पकाने का काम, दोनों कैसे साथ-साथ करती हैं। सुबह वे जल्दी उठकर रोटियां सेंकती हैं, सब्जी पकाती हैं। सब्जी भी ऐसी होनी चाहिए जो जल्दी पक जाए जैसे आलू, भिंडी या अरबी की सब्जी। कई बार वह रात का बचा हुआ खाना लेकर आ जाती हैं। सुबह इतना समय तो होता नहीं कि घर की साफ-सफाई और बर्तन वगैरह धोने के बाद शानदार खाना पकाया जाए। उन्हें काम पर भी आना होता है। कई बार वह दोनों रात का बचा चावल भूनकर ले आती हैं। तेल में प्याज, हरी मिर्च और टमाटर के साथ चावल को छौंक लगा लेती हैं। हंसते हुए कहती हैं, यह हमारी स्टाइल की ‘बिरयानी’ है।

लता जी बताती हैं कि वह रोजाना दोपहर 1 बजे खाना खाती हैं। दुकान के नाम पर उनके पास एक चारपाई और छोटी टेबल है। टेबल पर प्रेस की जाती है। वह खिड़की में बिकने वाला खाना नहीं खरीदतीं। एक बार उन्होंने एक दुकान से छोले खरीदे थे। उन्हें लगता है कि छोले बेचने वाला कुछ साफ-सफाई रखता है। हां, वह अपनी दुकान के सामने चाय की गुमटी लगाने वाले झा जी से चाय जरूर खरीदती हैं।

लता जी उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वृंदावन की रहने वाली हैं। जब उनसे पूछती हूं कि वृंदावन और दिल्ली के खाने में क्या फर्क है तो वह कहती हैं कि कोई खास फर्क नहीं है। पर दिल्ली में रहने और रोजाना की व्यस्त दिनचर्या के दौरान उन्होंने कुछ व्यंजन पकाने जरूर सीखे हैं।

लता जी याद करती हैं कि उन्होंने मैकरोनी बनाना तब सीखा था, जब वह ग्रेटर कैलाश 2 में एक बंगाली परिवार के साथ काम करती थीं। मकान मालिक और उसकी मां अक्सर काम खत्म करने के बाद उसे कुछ न कुछ खाने को देते थे। एक बार उन्होंने उसे कुछ अजीब सी चीज खाने को दी। उन्हें पता चला कि उसे मैकरोनी कहते हैं और वह घर पर बनाई जा सकती है। उन्होंने झटपट उसे बनाना सीखा और अब यह उनकी लेजर डाइट यानी मस्ती के समय का खाना बन गया है। हालांकि वह कहती हैं कि वह उसे अपनी स्टाइल से बनाती हैं जोकि दुकानों में मिलने वाली मैकरोनी से अलग है।

वह एक सिख परिवार के साथ बिताए दिनों को भी याद करती हैं। उस परिवार के घर में काम करने के दौरान उन्होंने एक अनूठा व्यंजन बनाना सीखा जोकि अंडे और ब्रेड से बनता है। वह व्यंजन भी झटपट बन जाता है और वह अक्सर उसे लंच के लिए खिड़की लेकर आती हैं। अंडे की जर्दी को नमक और चीनी के साथ फेंटकर उसे पकाया जाता है। फिर ब्रेड को उस घोल में डुबोकर तेल में तला जाता है। हमें एहसास होता है कि जिस व्यंजन की वह बात कर रही हैं, वह दरअसल ‘फ्रेंच टोस्ट’ है जिसे उन्होंने सिख परिवार से बनाना सीखा था।

तभी दुर्गा अपनी मां की पाक कला की तारीफ करते हुए हमारी बातचीत में शामिल हो जाती है। उसकी मां जो कुछ भी पकाती हैं, उनमें सबसे स्वादिष्ट उसे चूरमा रोटी लगती है। लता जी चूरमा अपनी तरह से बनाती हैं, जोकि राजस्थानी चूरमे से बहुत अलग है। वह परांठे को तोड़ती हैं, उसे मसलती हैं और फिर घी और चीनी के साथ पका लेती हैं। फिर उसे लड्डू की तरह गोल करती हैं और ठंडा होने पर खाने को देती हैं। इसे उत्तर प्रदेश में मलीदा कहा जाता है। कई बार वह टीवी देखकर भी खाना पकाना सीखती हैं। कुकरी के कार्यक्रमों से उन्होंने समोसा, मटर पनीर वगैरह बनाना सीखा है। वह कहती हैं कि कुकरी कार्यक्रमों से जो टिप्स मिलते हैं, उनका इस्तेमाल वह रोजाना का खाना पकाने में करती हैं।

यह पूछने पर कि वह छुट्टी के दिन उन्हें क्या करना पसंद है, वह कहती हैं- उस दिन वह किचन में शायद ही कभी जाती हैं और कई बार उनके रिश्तेदार उन्हें खाने पर बुला लेते हैं। दुर्गा अपनी मां के खाने की तारीफ करती है और याद करती है कि कभी मां बेसन और मैदे से परांठे बनाया करती हैं जिनमें लाल मिर्च और प्याज भी मिलाती हैं।

वह वेजिटेरियन और नॉन वेजिटेरियन, दोनों तरह का खाना खाती हैं। अंडे, मटन, चिकन सभी कुछ खाती हैं लेकिन मछली के बारे में पूछने पर थोड़ा नाक-भौं सिकोड़ती हैं। उसकी गंध उनसे बर्दाश्त नहीं होती। कई बार वह रात का बचा हुआ नॉन वेजिटेरियन खाना लंच के लिए पैक कर लेती हैं। वह कहती हैं कि नॉन वेजिटेरियन खाना सुबह बनाने का समय नहीं होता। उसे बनाने में अच्छा खासा समय लग जाता है। आप बिना भूने, उस स्वादिष्ट नहीं बना सकते, लता जी कहती हैं। वह नॉन वेजिटेरियन खाने को स्वादिष्ट बनाने के लिए काफी समय लगाना पसंद करती हैं।

भोजन और समुदाय के संबंधों पर बातचीत करने के दौरान वह अतीत की स्मृतियों में खो जाती हैं जब रोटियां तंदूर पर बना करती थीं और आस-पास के लोग घर पर रोटियां नहीं बनाते थे। लता जी बताती हैं, ‘किसी एक के घर के बाहर तंदूर रख दिया जाता था और आस-पास के लोग उस पर रोटियां बनाने आते थे। बीच-बीच में गपशप भी चलती रहती थी।‘ वह कहती हैं कि अब समय बदल गया है। उनकी आंखों में दुख का एक कतरा दिखाई देता है। वह धीमे से कहती हैं, समय के साथ स्मृतियां भी धुंधली पड़ने लगी हैं। साथ ही उन व्यंजनों की विधियां भी जो पहले जुबान पर रहती थीं।


Negotiate on their daily cooking/ food making

Lataji

Durga and her mother Lataji have a washing and ironing shop in the lanes of Khirki for almost two decades. Earlier she had her shop in a small corner with an asbestos roof on the road side, extension of one storied building with many tiny rooms for the migrant workers. Presently as the old building has got demolished, a new building is coming up, so the owner of the building promised Durga and her mother to give a small space for their business.

Durga and her mother come from Dakshinpuri every morning. While talking to them on how they negotiate on their daily cooking/ food making with work, she said that they get up early morning to make rotis and quick vegetable preparation. This can be aloo, bhindi, arbi ki sabji. Sometimes, they also bring the leftovers from last night’s dinner. In the morning, there is very less time after cleaning house and washing utensils, to prepare an elaborate meal. Then they have to rush to work as well. She often fries the leftover rice and brings it for lunch. The rice is prepared by frying the onions, chillies in oil and adding tomatoes and later the rice to it. She laughingly calls it her style of ‘Biryani’.

She every day eats her lunch around 1pm, in her small iron shop which is confined on a bed and a tiny table where she and her daughter do pressing clothes. She doesn’t want to buy food which she gets in the small joints in Khirki lanes. Once in a while, she buys chole from one of the vendors who she trusts in terms of cleanliness. But, she takes her daily tea from Jhaji’s tea shop, right opposite to where she sits.

She is from the very famous town of Vrindavan, Uttar Pradesh which is known for its religious institutions. When she was asked about the changes in the recipes of Vrindavan and Delhi, she inferred that there was no difference. However, she has learnt a few recipes while growing up in Delhi and also while negotiating with the everyday hectic schedule.

Lata Ji fondly remembers the time she used to work at a Bengali house in Greater Kailash-II where she learnt the recipe of Macaroni. The owner of the house used to live with her mother, and they would often serve her food after she would finish her work. One fine day, they served her something unique, as she noted. She found out that it is known as Macaroni and can be prepared easily at home. She quickly learnt the recipe and since then, Macaroni has been an important part of their leisure diet. But she adds that she prepares it her own way which is way different from the one that one gets at stalls.

She also remembers her experience of working at a Sardar’s house where she learnt a unique recipe made with eggs and bread. The recipe is quick and she often brings it for lunch to Khirki. It is prepared by taking the yellow portion out of the egg, beating it with salt and sugar. Then the bread is dipped in the concoction and fried in oil. We realized that she was explaining the recipe of ‘French Toast’ that she learnt from her employers.

Durga jumps in between to appreciate her mother’s culinary skills. Of all the food that her mother prepares, she loves ‘churma roti’ the most. Lata ji prepares churma her own way, unlike the famous Rajasthani churma. She tears the parantha and mash them, then cook them in ghee and sugar. She then rolls them in the shape of laddus and serves them when it is cold. It is known as Malidah in UP. She sometimes indulges in food items which she has learnt from TV. She learnt how to make samosa, matar paneer, etc. from the cookery shows. She adds them to her daily process of food preparation.

When asked about what she enjoys during her off days, she remarks that she barely goes to the kitchen and is often invited to relatives’ place for food. Durga, appreciating her mother’s culinary abilities, remembers the time when her mother would make paranthas, out of red chillies, onion and equal proportions of besan (gram flour) and maida (white flour).

She eats both vegetarian and non vegetarian food. She eats egg, mutton, chicken, but she cringed a bit, when she was asked about fish. It seems the odour is a bit troublesome for her. At times, she gets non-vegetarian food for lunch as well. However, that is always a left over from the last night dinner, as she says it takes time to cook non vegetarian and she likes to devote her concentration on making it delicious.

While talking about the relationship between food and community, she fondly remembered the times when rotis were prepared on Tandoor and nobody in the neighborhood would make rotis at home. “A Tandoor was kept outside one house and all the families of the area would come and make rotis on that tandoor engaging in occasional conversations”, said Lata Ji, lamenting on the changed scenario in recent times. With a hint of sorrow in her eyes, Lata ji explains how with age, the memory is going hazy and she often forgets the recipes.

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