खिड़की में लोकल लड़कियों के लिए कोई स्पेस नहीं

लता से बातचीत

मांबेटी की जोड़ी लता और रंजना से बात करना बड़ा मजेदार है। रंजना 45 साल की है और पिछले 14 साल से धोबी और प्रेसवाली का काम करती है। लता उसकी 22 साल की बेटी है। ये दोनों वृंदावन की रहने वाली हैं और धोबी जाति की हैं। लता बताती है कि मेरे मातापिता ने खिड़की गली के इस ठिकाने (प्रेस करने वाली जगह को वह ठिकाना कहती है) को किसी से खरीदा था। मैं दस साल की उम्र से अपनी मां के साथ काम करती हूं। मालवीय नगर के खिड़की गांव के कितने ही लोग हमसे प्रेस का काम करवाते हैं। सभी के साथ हमारा अच्छा रिश्ता है। हमें सबसे ज्यादा पसंद है नीरू आंटी जो हमारे ठिकाने के सामने रहती हैं। हमारा उनसे ऐसा रिश्ता है कि मैं कभी भी उनके घर जा सकती हूं और अपनी किसी भी समस्या के बारे में बात कर सकती हूं।

लता बताती है कि कुछ साल पहले उन्हें खिड़की के आसपास बने ‘जंगल’ से शॉर्टकट लेकर आना पड़ता था। हम डरते थे कि कोई अजबनी हमारा रास्ता रोकेगा तो क्या होगा। किसी वजह से हम मेन रोड से नहीं आ सकते थे। अब सब कुछ डेवलप हो चुका है। यहां मॉल बन गए हैं। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट कॉम्प्लेक्स, अस्पताल सब कुछ बन गए हैं। अब हम सुरक्षित महसूस करते हैं। बड़ीबड़ी बिल्डिंगों के कारण रात भर चहलकदमी होती रहती है। हर समय लोगों की भीड़ लगी रहती है। अब हमें शाम को सड़क पर चलने में बिल्कुल डर नहीं लगता। हमारे लिए यह बदलाव बहुत अच्छा है।

पहले लता और रंजना को खिड़की की गलियों में तरहतरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता था। सीवर लाइन खुली रहती थी, पानी जमा हो जाता था, जगहजगह गड्ढे थे। बारिश हुई नहीं कि गलियों में पानी भर जाता था। कई बार उन्हें घुटनों तक गंदे पानी में खड़े होकर प्रेस करना पड़ता था। ऐसे हालात में उन्हें कई बार कई दिनों तक अपना काम बंद करना पड़ता था। लता कहती है कि अब सड़कें अच्छी हो गई हैं और सीवरेज का काम हो गया है। अब गलियों में पानी भरने की उतनी समस्या नहीं है। इस इलाके में मल्टी स्टोरी बिल्डिंग भी बन गई है। मकान मालिक बाहर के लोगों, नए लोगों को किराये पर रखने लगे हैं। कितने सारे विदेशी यहां रहने लगे हैं। अब बहुत से अफ्रीकी लोग, ज्यादातर लड़के यहां घूमते मिल जाते हैं। कुछ चाइनीज टाइप (वह नॉर्थ ईस्ट वालों को चाइनीज कहती है) के होते हैं, कुछ अफगानी और कुछ कढ़ाई वाले (कढ़ाई करने वाले पूरबिये) और बिल्डिंग बनाने वाले ‘बिहारी’। कई बार विदेशी लोग भी अपने कपड़े हमसे प्रेस करवाने आते हैंहमें उनके कपड़े प्रेस करने में संकोच होता है क्योंकि वे हम उनसे पूरी तरह अनजान हैं। हमें लगता है कि उनके कपड़ों से एक खास किस्म की गंध आती है।

लता का कहना है कि ‘बिहारी लोग’ गलियों में हमेशा घूमते रहते हैं। कई बार अकेले और कई बार अपने जानने वालों के साथ। कई बार वे लोग नाई की दुकान पर या वीडियो शॉप पर लगे टीवी के आगे खड़े रहते हैं। लता को यह अच्छा नहीं लगता क्योंकि उसे लगता है कि अक्सर ये लोग गली की लड़कियों को घूरते रहते हैं। उसे भी। इससे उसे चिढ़ होती है क्योंकि उनके सामने से गुजरना उसे पसंद नहीं है। लता कहती है कि यह इलाका कितना भी विकसित क्यों न हो जाएयह स्थिति कभी नहीं बदलती। यहां घूमने वाले मर्द कई बार गली में रास्ता रोक देते हैं। उन्हें हटने को कहना पड़ता है। वह यह भी कहती है कि खिड़की में विदेशी लोगों के आने के बाद से उसे अजीब सा लगता है। सड़क के किनारे बनी दुकानों से उसे कोई परेशानी नहीं होती। यहां बहुत से लोग काम करने आते हैं। पर इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक बात लता और कहती है। उसका कहना है कि खिड़की में लोकल लड़कियों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है जहां वे सम्मान के साथ और बिना चिंता के घूम सकें।

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