तरक्की होती गई, लोग आगे बढ़ते गए

कमलेश जी से बातचीत

अच्छा कमलेश जी, आप लाहौर से दिल्ली आई थीं ना, तो वहां के बारे में कुछ बताइए।

नहीं, लाहौर से मेरे मातापिता यहां आए थे। मैं तो दिल्ली में ही पैदा हुई।

तो आप मालवीय नगर में कब से हैं ?

मेरी शादी 20-22 साल में हो गई थी। मैं शादी करके यहां आई थी। तब से अब तक यह इलाका बहुत बदल गया है। पहले यहां सब खुलाखुला सा था। कम लोग रहते थे। मालवीय नगर में इतनी बसावट नहीं थी। अब बहुत से लोग आ गए हैं। पुराने लोग अब रहे नहीं। नएनए लोग आ गए हैं। पुराने लोग मकान बेचकर चले गए और यहां मालवीय नगर में फ्लैट सिस्टम हो गया।

पहले मालवीय नगर में लोगों के मकान एकमंजिला थे। अब लोगों ने अपनेअपने घरों में चारचार मंजिलें बना ली हैं। कंस्ट्रक्शन भी बहुत हो गया है। इससे पानी की शॉर्टेज हो गई है। पहले मालवीय नगर में पूरे दिन पानी आता था। लेकिन अब पूरे दिन पानी नहीं आता।

तब क्या यह जगह गांव जैसी थी?

नहीं जी, गांव जैसा बिल्कुल नहीं था। हां, यहां खुलाखुला सा था। मतलब, इलाका हवादार था। अगर मकानों की मंजिलें ऊंचीऊंची हो जाएंगी तो खुलापन कहां रहेगा? कोई इलाका हवादार कैसे रहेगा? अब लोगों ने मकानों को आगे बढ़ाते हुए सड़क को भी घेर लिया है। आगे पेड़पौधे लगा दिए हैं। उसके आगे भी लोग अपनी गाडि़यां खड़ी कर देते हैं। पहले मकान टू साइड ओपन थे। दोनों तरफ आंगन था, तो बच्चे अपने आंगन में खेल लेते थे। अब बच्चों के खेलने के लिए आंगन नहीं है। उन्हें सड़कों पर खेलना पड़ता है या कभीकभी पार्क चले जाते हैं। हां, पहले इतने अच्छे पार्क नहीं थे। अब पार्क बहुत अच्छे बन गए हैं।

बस यही सब कुछ है। तब जैसे ही सूरज निकलता था, हम एकदम अपने आंगन में बैठ जाते थे। धूप सेंकते थे। 10-11 बजे जब सूरज पिछवाड़े चला जाता तो हम वहां चले जाते। पिछवाड़े बैठ जाते। अब बिल्डिंग बनने से न तो हवा रही और न धूप। पहले जैसी बात अब नहीं रही। लोग अपने कमरों में बंद होकर रह गए हैं। अब लोगों के पास समय नहीं है। पहले लोगों के पास समय था। लोग बाहर आंगन में बैठते थेमूंगफलियों का मजा लेते थे। कोई गन्ने चूस रहा होता था। लोग आपस में अपनी बातें शेयर करते थे।

अब किसी के पास समय नहीं है। कोई साथसाथ नहीं बैठता। बच्चों को भी स्कूलों से ढेर सारा होमवर्क मिलता है। स्कूल से आने के बाद वे पहले होमवर्क निपटाते हैं, फिर ट्यूशन चले जाते हैं। वहां से आकर थोड़ा बहुत सोते हैं, फिर खाना खाते हैं। इस रूटीन में मांबाप के पास भी इतना टाइम नहीं होता कि बच्चों के साथ बैठें।

अब बच्चे सड़कों पर ज्यादा खेलते हैं। आजकल इतनी मोटरगाडि़यां, बाइक, स्कूटर वगैरह हैं कि सड़कों पर भीड़ सी लगी रहती है। मिनट मिनट में सड़कों पर गाडि़यां आतीजाती रहती हैं। बच्चे सड़क पर खेलते हैं तो एक्सीडेंट होने का डर रहता है। पहले बच्चों के पास इतने खिलौने भी नहीं होते थे। कोई स्टापू खेलता था, कोई बॉल। कुछ बच्चे पार्को में जाकर पतंग उड़ाते थे।

पहले औरतों की जिंदगी बहुत अच्छी थी। अब तो सभी बिज़ी हो गई हैं। नौकरियां करती हैं। चालीसपैंतालीस साल पहले औरतें इतनी पढ़ीलिखी नहीं थीं। हाउस वाइफ्स ज्यादा थीं। अब जैसेजैसे पढ़ाईलिखाई बढ़ रही है, लोग भी आगे बढ़ रहे हैं। अब लोग पढ़ते भी हैं और नौकरियां भी करते हैं। बच्चों को अच्छी एजुकेशन देते हैं। बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाते हैं। पहले मिडल क्लास के लोग बच्चों को गवर्मेंट स्कूल में भेजते थे। अब लोग सोचते हैं कि बच्चों को अच्छे प्राइवेट स्कूल में भेजें। गवर्मेंट स्कूलों में तो वही बच्चे पढ़ते हैं जो ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर सकते। अब देखिए, मेरी पोती भी पब्लिक स्कूल में पढ़ती है। जबकि हम लोग खुद गवर्मेंट स्कूल में पढ़े हैं। उसकी दो महीने की फीस दोढाई हजार रुपये है। अब वह सेकेंड क्लास में गई है तो फीस और ज्यादा हो गई है।

पहले के लोगों में प्रेम भाव था। आपस में मिलजुल बैठते थेगप्पें मारते थे। अब किसी के पास दूसरे इनसान के लिए समय नहीं है। पहले परिवारों में तंदूर का चलन था। लोग तंदूर जलाते थेरोटियां पकाते थे। हर घर के आगे तंदूर होता थालोगों ने अपने छोटेछोटे तंदूर बनाए थे। अब तंदूरी रोटी खानी है तो रेस्त्रां में जाओ। वहीं मिलती है ऐसी रोटी। घरों में तो तंदूर रहे नहीं। हां, तंदूर खरीदकर लाओ अब तो। पहले मोहल्ले में एक चूल्हा होता थातंदूर होता था। उसमें आठ दस लकडि़यां डाल लेते थे। पहले एक ने रोटियां बनाईं, फिर लकडि़यां डालीं और तंदूर फिर से गर्म हो गया। फिर दूसरे ने रोटियां बना लीं। ऐसे गली मोहल्ले में सभी रोटियां सेंक लेते थे। लेकिन अब वह बात नहीं रही।

माता जी, उसके बाद क्या हुआ?

उसके बाद क्या हुआलोगों ने अपने घरों में गैस चूल्हा ले लिया। नई जनरेशन आ गई। वह तंदूर पर नहीं, गैस पर रोटियां बनाने लगी। जैसेजैसे तरक्की होती गई, लोग आगे बढ़ते गए। पहले स्टोव आया, फिर स्टोव भी बंद हुआ और अब गैस चूल्हे पर खाना बनता है। आजकल की लड़कियां उस तरह से खाना बनाना कहां पसंद करेंगी। फिर ईंधन मिलना भी बंद हो गया। पहले जलावन के लिए लकडि़यां मिल जाती थीं। अब लकडि़यां मिलना भी मुश्किल है क्योंकि जंगलों की कटाई बंद हो गई है। पहले घरों के पास पेड़पौधे थे, शहतूत और जामुन के। तो लोग वहां से लकडि़यां इकट्ठी कर लेते थे। आजकल सरकार ने उस पर भी पाबंदी लगा दी है। अब वह सब नहीं रहा। लकड़ी ही नहीं मिलेगी तो तंदूर जलाओगे कैसे? लकडि़यां मोल लेकर आओ तो बहुत महंगा पड़ेगा। आजकल तो मोहल्ले में लकडि़यों की टाल भी नहीं मिलती। आप ढूंढते रह जाएंगे। हम सर्दियों में कमरे को गर्म करने के लिए कच्चा कोयला लाते हैं। वह भी 40-50 रुपए किलो है।

पहले औरतें मिलबैठकर सिलाई बुनाई करती थीं। एक दूसरे को देखकर सीखती थीं। स्वेटर घरों में बनाती थीं पर अब लोग रेडीमेड स्वेटर पहनते हैं। क्योंकि किसी के पास स्वेटर बुनने का समय नहीं है। यंग लेडीज़ अब भी पार्क में आती हैं लेकिन सिर्फ राउंड लगाने। उन्हें और किसी से मतलब नहीं। राउंड लगाया, फोन पर बात की और चली गईं। कुछ ही हैं जो अपने बच्चों के साथ पार्क में आती हैं। बच्चे खेलते हैं तो वे बैठकर गप्पें मार लेती हैं। हां, एजेड लेडीज़ जरूर बातें करती हैं।

आप सभी एक दूसरे से बातचीत करती हैं?

हां, हम सब एक दूसरे से बातें करते हैं। एक दूसरे से अपनी बातें शेयर करते हैं। यंग लेडीज़ जो अपने बच्चों के साथ आती हैं, वे भी हमारी बातों में शामिल होती हैं। इस तरह एक दूसरे से जानपहचान हो जाती है। पर अब पहले जैसा मिलनाजुलना नहीं रहा। सभी अपनेअपने अपने घरो में मस्त रहते हैं। एसीकूलर चलाया। टीवी चलाया और कमरा बंद करके बैठ गए। आजकल वह बात नहीं रही कि एक दूसरे से मिलनाजुलाना है।

आज तो हालत यह है कि अगर पड़ोस के किसी घर में आग भी लग जाती है तो बहुत देर में पता चलता है। पहले ऐसा नहीं था। पहले सब खुलाखुला था। किसी घर में क्या हुआ, सभी को पता रहता था। अब लोग दरवाजे बंद करके बैठते हैं तो बाहर का कुछ पता नहीं चलता।

हमारे समय में अच्छा था। बहुत सी खुशियां थीं। अब तो लड़कियां बाहर भी नहीं जा सकतीं। लड़के सड़कों पर होते हैं तो डर बना रहता है। पहले ऐसा नहीं था। लड़कियां कहीं भी अपनी मर्जी से जा सकती थींकोई डर नहीं होता था। अब इतना डर है कि बच्चे कहीं जा ही नहीं सकते।

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